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बंगाल चुनाव 2026: बनगांव क्षेत्र के विधानसभा सीटों पर सियासी घमासान, टीएमसी के गढ़ में भाजपा की नजर

 

कोलकाता, 17 मार्च (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल की बनगांव लोकसभा सीट, जो 2009 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई, अब आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर फिर से राजनीतिक केंद्र में आ गई है। पहले यह इलाका बारासात संसदीय क्षेत्र का हिस्सा था, लेकिन अलग सीट बनने के बाद से लंबे समय तक यहां तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का प्रभाव बना रहा है।

उत्तर 24 परगना जिले में स्थित बनगांव क्षेत्र का कुछ हिस्सा नादिया जिले में भी आता है। इस संसदीय क्षेत्र के तहत सात विधानसभा सीटें- कल्याणी, हरिनघाटा, बाग्दा, बनगांव उत्तर, बनगांव दक्षिण, गैघाट और स्वरूपनगर आती हैं, और सभी सीटें अनुसूचित जाति (एसी) के लिए आरक्षित हैं। यही वजह है कि यह इलाका सामाजिक और राजनीतिक दोनों ही लिहाज से बेहद अहम माना जाता है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, विधानसभा चुनाव में इन सात सीटों का प्रदर्शन पूरे इलाके के सियासी समीकरण तय कर सकता है। अब तक लोकसभा चुनावों में टीएमसी का दबदबा रहा है, लेकिन 2019 के बाद भाजपा ने यहां बड़ी सेंध लगाई थी। भाजपा इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ बना रही है और अब पार्टी विधानसभा चुनाव में इसे भुनाने की कोशिश में है।

दरअसल, बनगांव और आसपास का इलाका मतुआ समुदाय का गढ़ माना जाता है, जो चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। 1947 के विभाजन के बाद यहां बसे इस समुदाय की आबादी लाखों में है और उत्तर व दक्षिण 24 परगना की कई सीटों पर इसका सीधा असर पड़ता है। यही कारण है कि सभी प्रमुख दल इस समुदाय को साधने की कोशिश में जुटे रहते हैं।

जनसांख्यिकीय आंकड़े भी इस सीट की अहमियत को दर्शाते हैं। यहां करीब 75 फीसदी आबादी ग्रामीण है, जबकि अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी 40 फीसदी से अधिक है। ऐसे में सामाजिक समीकरण विधानसभा चुनाव में निर्णायक साबित हो सकते हैं।

पिछले चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो टीएमसी ने 2009 और 2014 में मजबूत पकड़ बनाए रखी, वहीं 2015 के उपचुनाव में भी पार्टी ने जीत दर्ज की थी। हालांकि 2019 के बाद भाजपा ने यहां स्थिति बदली है। साथ ही, वाम दल भी यहां अपनी जमीन तलाशने में जुटे हैं, लेकिन फिलहाल मुख्य लड़ाई टीएमसी और भाजपा के बीच मानी जा रही है।

विधानसभा चुनाव में बनगांव लोकसभा क्षेत्र की सातों सीटें न केवल स्थानीय बल्कि राज्यस्तरीय राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। ऐसे में यह सीट एक बार फिर सियासी दलों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है।

--आईएएनएस

डीएससी