भगवान महावीर के मंदिर पर हक की जंग: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी, जानिए क्या है 1991 के पूजा स्थल एक्ट का पूरा विवाद
प्रसिद्ध श्री महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन और संचालन को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर जैन संप्रदायों के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सुनवाई पूरी कर ली। कोर्ट ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। दोनों पक्षों को आठ दिन के भीतर लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया गया है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मामले की धार्मिक संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की। कोर्ट ने कहा कि यह विवाद धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे आपसी समझदारी से खत्म करने की कोशिश होनी चाहिए।
'जिस भगवान के नाम पर लड़ रहे हैं, क्या वह इससे खुश होंगे?'
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के सामने समझौते की संभावना भी रखी।
न्यायमूर्ति पारदीवाला ने कहा कि यह बेहद संवेदनशील मामला है और किसी भी पक्ष की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाए बिना विवाद को समाप्त करने की जरूरत है। उन्होंने दोनों पक्षों से सवाल किया कि क्या ऐसा संभव नहीं है कि सुबह श्वेतांबर संप्रदाय अपनी परंपरा के अनुसार पूजा करे और शाम को दिगंबर संप्रदाय अपनी परंपरा के अनुसार पूजा कर सके।
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि दोनों पक्ष भगवान के नाम पर आपस में कानूनी लड़ाई क्यों लड़ रहे हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि क्या भगवान इस तरह की मुकदमेबाजी से खुश होंगे?
कैसे शुरू हुआ मंदिर प्रबंधन का विवाद?
यह विवाद मंदिर के प्रबंधन और संचालन को लेकर सामने आया है। मामले की जड़ लोक न्यास अधिनियम, 1959 के तहत शुरू हुई कार्यवाही से जुड़ी है।
विवाद में दिगंबर समिति के अध्यक्ष और सचिव को मंदिर प्रबंधन से हटाने तथा श्वेतांबर संप्रदाय की नई प्रबंध समिति गठित करने की मांग की गई थी।
बताया गया है कि वर्ष 1970 में एसडीएम ने दिगंबर समिति के खिलाफ एक प्रार्थना पत्र को मंजूरी दी थी। इसके बाद पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 से जुड़े प्रार्थना पत्र के आधार पर अक्टूबर 1994 में ट्रायल कोर्ट ने मामले में रोक लगा दी थी।
इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। दिगंबर समिति की ओर से हाईकोर्ट में इस कार्रवाई का विरोध किया गया और तर्क दिया गया कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही पहले ही समाप्त हो चुकी थी।
श्वेतांबर पक्ष ने क्या दलील दी?
वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने श्वेतांबर पक्ष की ओर से दलील रखते हुए कहा कि इस मामले में किसी पूजा स्थल को बदलने या उसके स्वरूप में परिवर्तन की मांग नहीं की गई है।
उनका तर्क था कि इसलिए पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 इस मामले में लागू नहीं होता। उनके मुताबिक विवाद मुख्य रूप से मंदिर के प्रबंधन और पूरे जैन समुदाय के हित से जुड़ा हुआ है।
दिगंबर समिति ने क्या कहा?
दिगंबर समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने हाईकोर्ट में हुई कार्यवाही पर सवाल उठाया।
उनका कहना था कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही समाप्त हो चुकी थी और उस आदेश के खिलाफ अपील का प्रावधान नहीं था। ऐसे में हाईकोर्ट में अपील के बजाय याचिका के जरिए मामला उठाया जाना चाहिए था।
दिगंबर समिति की ओर से यह भी कहा गया कि मंदिर की मूर्ति, मंदिर परिसर और उससे जुड़ी संपत्तियों का नियंत्रण, कब्जा और प्रबंधन अब भी दिगंबर जैन संप्रदाय के पास है।
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद बुधवार को सुनवाई पूरी कर ली और फैसला सुरक्षित रख लिया। अदालत ने दोनों पक्षों को आठ दिन के भीतर अपनी लिखित बहस दाखिल करने को कहा है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई समझौते की सलाह भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि धार्मिक आस्था से जुड़े इस विवाद को केवल कानूनी लड़ाई तक सीमित रखने के बजाय आपसी सहमति से समाधान निकालने की कोशिश की जानी चाहिए।
अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर है, जिससे श्री महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन और संचालन को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है।