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बहादुरी बेमिसाल: सिख अध्‍यात्मिक गुरु राम सिंह, जिनके नाम से अंग्रेजों की उड़ जाती थी नींद

 

नई दिल्ली, 2 फरवरी (आईएएनएस)। 3 फरवरी सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि ये दिन साहस, धर्म और अदम्य हौसले के जन्म का है। साल 1816 में इसी दिन लुधियाना के भैणी गांव में एक ऐसा शख्स जन्मा, जिसने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी थी और सिख समाज को न सिर्फ जागरूक किया, बल्कि उसे सामाजिक और धार्मिक कुरीतियों से भी मुक्त कराने का संदेश दिया। ये शख्स थे बाबा राम सिंह कूका।

बचपन में ज्यादा पढ़ाई-लिखाई नहीं हुई, लेकिन राम सिंह का दिल हमेशा धर्म और आध्यात्म की ओर था। उनके पिता जस्सा सिंह ने उन्हें बढ़ई का काम सिखाया, लेकिन राम सिंह उसमें सफल नहीं हो पाए। पिता ने फिर उन्हें शेर सिंह की सेना में भेज दिया। लेकिन कहते हैं, जहां दिल में आध्यात्म की ज्योति हो, वहां भौतिक युद्ध ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकता।

सेना में एक बार पेशावर जाने के दौरान उनका सामना हुआ संत बालक दास से। बालक सिंह ने उन्हें देखते ही कहा, "मैं तेरा ही इंतजार कर रहा था।" इसी मुलाकात ने राम सिंह के जीवन का पूरा नक्शा बदल दिया। उन्होंने गुरु मंत्र ग्रहण किया और एक संदेश अपने दिल में हमेशा के लिए बसा लिया कि धर्म और नैतिकता का मार्ग ही सच्चे वीरता की पहचान है।

सन् 1845 में राम सिंह ने सेना छोड़ दी और भैणी साहिब लौट आए, जहां उन्होंने सिख धर्म और खालसा पंथ की गहरी तालीम हासिल की। धीरे-धीरे उनका नाम एक सदगुरु और समाज सुधारक के रूप में फैलने लगा। उनके अनुयायी जानते थे कि बाबा राम सिंह सिर्फ आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि एक नेता भी हैं जो समाज को सही दिशा दिखा सकते हैं।

12 अप्रैल 1857 को राम सिंह ने अपने पांच अनुयायियों को अमृत संचार दीक्षा दी और नामधारी संप्रदाय की स्थापना की। नामधारी इसलिए, क्योंकि उनके अनुयायी भगवान को अपने मन और आत्मा में धारण करने का प्रयास करते थे। राम सिंह का मानना था कि जो नैतिक है, वही अपने देश और समाज के लिए बलिदान दे सकता है। उन्होंने पुरुषों और स्त्रियों में असमानता को कम करने की दिशा में भी काम किया।

बाबा राम सिंह सिर्फ आध्यात्मिक गुरु नहीं थे। उन्होंने कूका विद्रोह की अगुवाई की और पंजाब में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन शुरू किया। उनके नेतृत्व में लोग अंग्रेजों की बनाई शिक्षा, कारखानों में बने कपड़े और कई चीजों का बहिष्कार करने लगे। अंग्रेजों की नींद उड़ गई। डर और हताशा में उन्होंने क्रांतिकारियों को पकड़ना शुरू किया। बाबा राम सिंह को रंगून और बाद में अंडमान की जेल में भेजा गया।

14 साल की कड़ी यातनाओं और अत्याचार के बाद 1885 में उनका देहांत हुआ, लेकिन उनकी सोच, उनका साहस और उनकी निष्ठा आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।

--आईएएनएस

पीआईएम/डीकेपी