औरंगाबाद के पुनपुन तट पर उमड़ा आस्था का जनसैलाब, पितृ मोक्ष के लिए हजारों श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान
औरंगाबाद, 30 सितंबर (आईएएनएस)। बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित ऐतिहासिक पुनपुन घाट पर इन दिनों आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। 15 दिवसीय पितृपक्ष मेले के अवसर पर देश-विदेश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन आदिगंगा के नाम से विख्यात पुनपुन नदी के तट पर पहुंच रहे हैं। यहां अपने पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए पिंडदान कर श्रद्धालु गया जी के लिए प्रस्थान कर रहे हैं।
पुनपुन घाट पर मौजूद तीर्थ पुरोहित ने आईएएनएस को बताया कि पितृपक्ष आश्विन मास के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तिथि तक मनाया जाता है। इस दौरान पितरों को सद्गति प्रदान करने के लिए श्राद्ध का विशेष आयोजन किया जाता है। यह जगह आदिगंगा है। गयाजी जाने से पहले यहां पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे पितृ कर्म किए जाते हैं। ऐसा करने से पितरों को सद्गति प्राप्त होती है और उनके वंशजों को सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
उन्होंने कहा, "पुराणों में कुल 45 वेदियों की कथा है, जिसमें पांच तीर्थ बहुत प्रमुख हैं - सीता कुंड, फल्गु तीर्थ, विष्णु पद, प्रेत शिला और आदि गंगा पुनपुन।"
एक अन्य विद्वान ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि पूर्वज पृथ्वी लोक पर भटकते रहते हैं और उन्हें मोक्ष नहीं मिलता। मोक्षदायिनी गया जी में पिंडदान करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण के अनुसार पुत्र होने का महत्व भी इसी से जुड़ा है। पितृ ऋण से तभी मुक्ति मिलती है जब पुत्र अपने माता-पिता का श्राद्ध करे।
मध्य प्रदेश के सतना से आए एक श्रद्धालु ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, "हम अपने पिताजी का पिंडदान करने आए हैं। हमारे पूर्वज बताते हैं कि बिना पुनपुन में पिंडदान किए गया जी का श्राद्ध अधूरा है। हिंदू धर्म में इसकी बहुत बड़ी आस्था है। गया श्राद्ध करने से हमारे पितरों को मुक्ति मिलती है।"
ग्वालियर से आई एक महिला श्रद्धालु ने कहा, "जो हमारे बड़े-बुजुर्ग बताते हैं, उसी परंपरा के अनुसार हम यहां पूजा-पाठ और जल अर्पण करने आए हैं ताकि हमारे पितरों की आत्मा को शांति मिले। मैं अपने ससुर, सास और बाबा ससुर का श्राद्ध करने आई हूं।"
एक अन्य महिला ने बताया कि वह अपने बेटे के साथ अपने पति का श्राद्ध करने के लिए पुनपुन तट पर पहुंची हैं।
हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार मगध क्षेत्र की प्रथम वेदी मानी जाने वाली आदिगंगा पुनपुन के तट पर पिंडदान का विशेष महत्व है। मान्यता है कि त्रेता काल में भगवान श्री राम ने भी अपने पितरों की मोक्ष प्राप्ति के लिए गया जी में श्राद्ध किया था, वहीं द्वापर काल में महाभारत के युद्ध के उपरांत पांडवों ने भी अपने पितरों और युद्ध में मारे गए स्वजनों की आत्मा की शांति के लिए गया जी में आकर पिंडदान किया था। तब से आज तक यह परंपरा अनवरत चली आ रही है।
हिंदू धर्म शास्त्रों वायु पुराण एवं पद्म पुराण में भी भगवान राम के गया श्राद्ध का विस्तृत वर्णन मिलता है। इन पुराणों में उल्लेख है कि भगवान राम तथा माता सीता ने गया क्षेत्र की प्रथम वेदी कही जाने वाली आदि गंगा पुनपुन के तट पर अपने पितरों के मोक्ष हेतु सबसे पहले पिंडदान किया था।
पिंडदान के उपरांत उन्होंने मां उमगेश्वरी की पर्वत श्रृंखला क्षेत्र में रात्रि विश्राम किया था, जिसे आज हम सीता थापा के नाम से जानते हैं। आज भी वहां माता सीता के हाथ के निशान मौजूद होने की मान्यता है, जिसके दर्शन के लिए सैकड़ों श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह स्थान आज औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड की मदनपुर पहाड़ी पर स्थित है, जहां से दूसरे दिन भगवान राम गया जी के लिए प्रस्थान किए थे।
--आईएएनएस
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