एआरएफआईडी से जूझ रहे बच्चों का इलाज संभव, स्टैनफोर्ड की नई रिसर्च में मिले सकारात्मक नतीजे
नई दिल्ली, 30 जून (आईएएनएस)। आजकल बच्चों में सिर्फ "पिकी ईटिंग", यानी चुन-चुनकर खाना खाने की आदत ही नहीं, बल्कि एक गंभीर स्थिति भी देखने को मिल रही है, जिसे एआरएफआईडी (अवायडेंट रेस्ट्रिक्टिव फ़ूड इनटेक डिसऑर्डर) कहा जाता है। स्टैनफोर्ड मेडिसिन के वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी में इस बीमारी के इलाज को लेकर बड़ी सफलता मिली है।
नई दिल्ली, 30 जून (आईएएनएस)। आजकल बच्चों में केवल "पिकी ईटिंग" यानी चुन-चुनकर खाने की आदत ही नहीं, बल्कि एक गंभीर स्थिति भी देखने को मिल रही है, जिसे एआरएफआईडी (अवायडेंट रेस्ट्रिक्टिव फ़ूड इनटेक डिसऑर्डर) कहा जाता है। स्टैनफोर्ड मेडिसिन के वैज्ञानिकों की एक नई स्टडी में इस बीमारी के इलाज को लेकर बड़ी सफलता मिली है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह पहली बार है कि एआरएफआईडी जैसे खान-पान संबंधी विकार के उपचार का मूल्यांकन रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल के जरिए किया गया है। यह अध्ययन 6 से 12 वर्ष की आयु के 98 बच्चों पर किया गया। इसके निष्कर्ष 'जर्नल ऑफ द अमेरिकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री' में प्रकाशित हुए हैं।
एआरएफआईडी से पीड़ित बच्चे भोजन में बहुत कम रुचि दिखाते हैं या फिर उन्हें खाने से डर लगता है। कई मामलों में यह समस्या बचपन से ही शुरू हो जाती है और समय पर इलाज न मिलने पर बच्चों के शारीरिक विकास पर असर पड़ सकता है।
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता जेम्स लॉक ने कहा कि पहली बार इस बीमारी के उपचार का वैज्ञानिक तरीके से परीक्षण किया गया है। उनके अनुसार, अब ऐसा वैज्ञानिक डेटा उपलब्ध है जिसकी मदद से खासकर उस आयु वर्ग के बच्चों का बेहतर इलाज किया जा सकता है, जिसमें यह समस्या सबसे अधिक देखी जाती है।
इस रिसर्च में दो तरह की थेरेपी को टेस्ट किया गया। पहली थी फैमिली-बेस्ड थेरेपी और दूसरी थी इंडिविजुअल मोटिवेशनल थेरेपी। दोनों ही ट्रीटमेंट ऑनलाइन दिए गए और हर बच्चे को चार महीने तक 14-14 सेशन मिले।
फैमिली-बेस्ड थेरेपी में माता-पिता को मुख्य भूमिका दी गई। उन्हें सिखाया गया कि बच्चे की खाने की आदतों को कैसे धीरे-धीरे बदलें। पूरा परिवार (माता-पिता, भाई-बहन और थेरेपिस्ट) एक साथ सेशन में शामिल होते थे। इसमें यह भी समझाया जाता था कि बच्चा जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहा, बल्कि यह एक मेडिकल कंडीशन है।
दूसरी तरफ, इंडिविजुअल थेरेपी में बच्चे को खुद मोटिवेट किया जाता था। इसमें बच्चों के साथ गेम्स, एक्टिविटी और कल्पना आधारित अभ्यास कराए जाते थे, जैसे कि काल्पनिक रेस्टोरेंट बनाना या अलग-अलग देशों के खाने के बारे में सोचना, ताकि उनकी खाने में रुचि बढ़े।
रिसर्च के नतीजे दिलचस्प रहे। जिन बच्चों ने फैमिली-बेस्ड थेरेपी ली, उनका वजन ज्यादा तेजी से बढ़ा और उनकी सेहत में सुधार दिखा। वहीं दोनों ही ग्रुप्स में एआरएफआईडी के लक्षणों में सुधार हुआ, यानी दोनों तरीके काफी हद तक कारगर पाए गए।
अध्ययन में शामिल एक बच्ची ने बताया कि पहले वह बहुत सीमित चीजें ही खाती थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने नए खाद्य पदार्थ आजमाने शुरू किए। पहले जिन चीजों से वह परहेज करती थी, जैसे अंडा, एवोकाडो, दही और फल, अब उन्हें पसंद करने लगी है।
रिसर्चर्स का कहना है कि एआरएफआईडी सिर्फ नखरे या चुन-चुनकर खाना खाने की आदत नहीं है, बल्कि यह एक वास्तविक मानसिक और शारीरिक समस्या है। अगर इसे नजरअंदाज किया जाए तो बच्चों में पोषण की कमी, कमजोरी, और विकास से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
स्टडी में यह भी पाया गया कि एआरएफआईडी उन बच्चों में ज्यादा देखा जाता है जिन्हें एंग्जायटी, एडीएचडी या ऑटिज्म जैसी समस्याएं होती हैं। कई बार बच्चे किसी डर या बुरे अनुभव के कारण भी खाना छोड़ देते हैं, जैसे किसी ने पहले कभी गला अटकने का अनुभव किया हो।
यह समस्या गंभीर है, लेकिन रिसर्च के मुताबिक अच्छी बात यह है कि इसका इलाज संभव है। डॉक्टरों का कहना है कि सही थेरेपी और परिवार के सहयोग से बच्चों की खाने की आदतों में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है।
--आईएएनएस
पीआईएम/एएस