अंतरराष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस: खोता बचपन, अनिश्चित भविष्य, बच्चों की सुरक्षा पर दुनिया की परीक्षा
नई दिल्ली, 31 मई (आईएएनएस)। जब दुनिया तनाव के दौर से गुजर रही है, गरीबी, भुखमरी, जलवायु परिवर्तन और अन्य अस्तित्वगत खतरे पहले से बरकरार हैं, तब सभी के सामने सबसे बड़ी चुनौती महज वर्तमान को संभालने की नहीं बल्कि भविष्य को सुरक्षित रखने की भी है। नई पीढ़ी ही किसी भी समाज और राष्ट्र के कल का आधार होती है। ऐसे में जब दुनिया के करोड़ों बच्चे हिंसा, शोषण, उपेक्षा, असमानता और असुरक्षा का सामना कर रहे हों, तब बच्चों की सुरक्षा सबसे अहम हो जाती है।
हर साल 1 जून को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय बाल रक्षा दिवस पूरी दुनिया को प्रेरित करता है कि सभी बच्चों का भविष्य उज्ज्वल हो, उन्हें स्नेह और सहयोग के साथ समानता से अवसर दिए जाएं। यह दिन याद दिलाता है कि हर बच्चा सपनों से भरा होता है और उसे स्नेह, सुरक्षा और समान अवसरों की जरूरत होती है। यह दिन प्रेरित करता है कि हम बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक ऐसा वातावरण बनाएं जहां वे बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ सकें। आज के वैश्विक परिदृश्य की परिस्थितियों को देखते हुए इस जिम्मेदारी को निभाना हर किसी के लिए और भी जरूरी हो जाता है।
आज औद्योगिक देशों में भी विकासशील देशों की तरह ही, चाहे वे समृद्ध पृष्ठभूमि से हों या वंचित पृष्ठभूमि से, और चाहे वे शांति और सुरक्षा में रह रहे हों या खतरनाक या आपातकालीन स्थितियों में, बच्चे भेदभाव, दुर्व्यवहार और शोषण के शिकार होते हैं।
विश्वभर में बच्चों के संरक्षण के अधिकारों को लेकर एक रिपोर्ट में दावा है कि हर साल 50 करोड़ से 15 करोड़ बच्चे हिंसा का शिकार होते हैं। इसके अलावा, हर साल लगभग 15 करोड़ लड़कियां और 7 करोड़ लड़के यौन शोषण का शिकार होते हैं। शोषण के अधिकतर मामले परिवार के भीतर ही घटित होते हैं या फिर बच्चे बाल श्रम के शिकार होते हैं।
हालात यहीं तक सीमित नहीं रहते। प्रतिदिन, दुनिया भर में लाखों बच्चे भेदभाव का शिकार होते हैं। वे अपमानजनक, आपत्तिजनक गालियों या इससे भी बदतर, हिंसा के शिकार निर्दोष बन जाते हैं। बेहद असुरक्षित स्थिति में इन बच्चों के पास कोई सहारा नहीं होता और वे अपना बचाव भी नहीं कर सकते।
स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ रही है। खाद्य संकट पर वैश्विक रिपोर्ट (जीआरएफसी) के अनुसार, 2024 में 53 देशों और क्षेत्रों में 29.5 करोड़ से अधिक लोग तीव्र भूख का सामना कर रहे थे। वहीं, सेव द चिल्ड्रन की रिपोर्ट कहती है कि 2024 में 18.2 मिलियन बच्चे भूखमरी के बीच पैदा हुए, जिसमें 2019 की तुलना में 19 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
कुपोषण और खाद्य असुरक्षा बच्चों के विकास, सीखने और जीवित रहने पर असर डालती है। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में 5 वर्ष से कम आयु के 150.2 मिलियन बच्चे बौनेपन से पीड़ित थे, 42.8 मिलियन बच्चे दुबलेपन से पीड़ित थे, और 35.5 मिलियन बच्चे अधिक वजन वाले थे।
ऐसे में वैश्विक तनावों का भी गहरा असर बच्चों पर पड़ता है। जब स्कूलों पर बमबारी होती है या उन्हें सैन्य बैरकों में तब्दील किया जाता है तो शिक्षा व्यवस्था, युद्ध के सामने घुटने टेकने के लिए विवश नजर आती है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में रह रहे लाखों-करोड़ों बच्चों के लिए हिंसक टकराव की कीमत सिर्फ शिक्षा का ठप हो जाना नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा, स्थिरता और उस भविष्य का भी नुकसान है।
यूनीसेफ की जनवरी 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में स्कूली उम्र के 23 करोड़ 40 लाख से अधिक बच्चे संकटों से प्रभावित रहे हैं। इनमें से 8.5 करोड़ बच्चे स्कूली शिक्षा से पूरी तरह वंचित रहे हैं या किसी भी तरह की शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाए हैं। यूनीसेफ ने रिपोर्ट में दावा किया कि 2026 के आखिरी तक 60 लाख अतिरिक्त बच्चे स्कूल से बाहर हो सकते हैं।
इन परिस्थितियों में बच्चों का हर समय और हर जगह संरक्षण बहुत जरूरी हो जाता है।
--आईएएनएस
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