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अहिल्याबाई होल्कर: ससुर के कहने पर सती प्रथा को ठुकराकर संभाला मालवा साम्राज्य, बदली शासन और न्याय की परिभाषा

 

नई दिल्ली, 30 मई (आईएएनएस)। यह अठारहवीं शताब्दी के भारत की बात है। वर्तमान महाराष्ट्र के चोंडी गांव के एक छोटे से शिव मंदिर की सीढ़ियों पर आठ वर्ष की एक बच्ची पूरी तन्मयता से धूल साफ कर रही थी। उसी समय मराठा साम्राज्य के महान सेनापति और मालवा के सूबेदार मल्हार राव होल्कर अपनी सेना के साथ वहां से गुजर रहे थे।

विश्राम के लिए रुके सेनापति की नजर उस बच्ची पर पड़ी। उसकी सादगी, चेहरे का तेज और भगवान शिव के प्रति अटूट भक्ति देखकर मल्हार राव ठिठक गए। उन्होंने तुरंत पहचान लिया कि इस साधारण धनगर (गड़रिया) परिवार की बालिका में कोई असाधारण बात है। उन्होंने बिना देर किए अपने पुत्र खांडेराव के लिए उसका हाथ मांग लिया।

यही वह ऐतिहासिक मोड़ था जिसने 'अहिल्या' नाम की एक ग्रामीण बालिका को भारत की सबसे महान शासिकाओं में से एक—महारानी अहिल्याबाई होल्कर (शासनकाल: 1767–1795) के रूप में इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज करा दिया।

मालवा साम्राज्य की महान और न्यायप्रिय महारानी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के चोंडी गांव में हुआ था। उनके पिता, मानकोजी राव शिंदे, उस गांव के मुखिया (पाटिल) थे।

विवाह के बाद अहिल्याबाई की सास गौतमा बाई ने उन्हें अपनी बेटी की तरह पाला और राज्य के बही-खाते तथा कूटनीति की शिक्षा दी, लेकिन खुशियों को ग्रहण तब लगा जब वर्ष 1754 में कुम्हेर के युद्ध में उनके पति खांडेराव वीरगति को प्राप्त हो गए।

तत्कालीन क्रूर सामाजिक प्रथा के अनुसार अहिल्याबाई सती होने जा रही थीं, लेकिन उनके ससुर मल्हार राव ने रोते हुए उनका हाथ थाम लिया और कहा, "बेटी, अगर तुम भी चली गईं, तो इस साम्राज्य को कौन संभालेगा?" मल्हार राव ने उन्हें सती होने से रोका और अपनी राजनीतिक विरासत सौंप दी।

वर्ष 1766 में ससुर मल्हार राव और उसके ठीक एक वर्ष बाद (अप्रैल 1767) उनके एकमात्र पुत्र मालेराव की असमय मृत्यु हो गई। जब साम्राज्य के लालची दीवान गंगाधर यशवंत ने उन्हें एक कमजोर विधवा समझकर दत्तक पुत्र लेने और सत्ता सौंपने की साजिश रची, तो अहिल्याबाई ने शेरनी की तरह दहाड़ते हुए उस चाल को नाकाम कर दिया। उन्होंने पेशवा माधवराव प्रथम को पत्र लिखकर मालवा का सीधा नियंत्रण अपने हाथ में लिया और इतिहास को एक नया शासक दिया।

वे हर रोज जनता के बीच बैठकर सीधे उनकी समस्याएं सुनती थीं। अठारहवीं सदी के उस दौर में, जब तलवार ही न्याय का फैसला करती थी, अहिल्याबाई ने अपने 28 वर्षों के शासनकाल में किसी को भी मृत्युदंड नहीं दिया। वे अपराधियों को जेल भेजने के बजाय उनसे सुधारने का व्यक्तिगत वचन लेती थीं।

उन्होंने किसानों के लिए '7/12 कृषि योजना' लागू की, जिसके तहत राज्य खुद खेती का खर्च उठाता था और मुनाफे को किसानों के साथ बांटता था। अक्टूबर 2024 में महाराष्ट्र सरकार ने उनके सम्मान में अहमदनगर जिले का नाम बदलकर आधिकारिक रूप से 'अहिल्यानगर' कर दिया।

सितंबर 2024 में शुरू की गई 'पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर महिला स्टार्टअप योजना' महिलाओं को 25 लाख रुपए तक की आर्थिक मदद देकर आज भी उनके आर्थिक सशक्तिकरण के सपने को सच कर रही है। वर्ष 2025 में उनकी 300वीं जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री द्वारा 300 रुपए का विशेष चांदी का स्मारक सिक्का जारी किया गया। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में भी उनकी दिव्य प्रतिमा स्थापित की गई है।

13 अगस्त 1795 को सत्तर वर्ष की आयु में जब इस महान चेतना ने अंतिम सांस ली, तब तक वे भारत के इतिहास में एक शासिका से ऊपर उठकर 'लोकमाता' और 'देवी' का स्थान पा चुकी थीं।

--आईएएनएस

वीकेयू/वीसी