अधूरे इश्क ने उठवाई कलम, अल्फाज ऐसे कि लाखों दिलों की आवाज बन गए निदा फाजली
नई दिल्ली, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। शायरी करना आसान हो सकता है लेकिन ऐसे अल्फाज लिखना बहुत मुश्किल है, जिन्हें पढ़कर किसी को अपना दर्द याद आ जाए, किसी को मोहब्बत का एहसास हो और किसी को जिंदगी जीने का नया नजरिया मिल जाए। हिंदी और उर्दू साहित्य में निदा फाजली एक ऐसा ही नाम हैं, जिनकी शायरी सीधे दिल तक पहुंचती है। उन्होंने आम आदमी की जिंदगी, उसके संघर्ष, रिश्तों, मोहब्बत और इंसानियत को इतने सरल शब्दों में बयां किया कि उनके शेर लोगों की जुबान पर चढ़ गए। आज भी उनकी शायरी पढ़ते हुए लगता है, जैसे उन्होंने हमारे ही मन की बात कह दी हो।
निदा फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। उनका असली नाम मुक्तदा हसन था। बचपन ग्वालियर में बीता और वहीं उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई। उनके पिता मुर्तुजा हसन भी शायरी करते थे, इसलिए साहित्य से उनका परिचय बचपन से ही हो गया था। हालांकि, निदा की शायरी की आवाज धीरे-धीरे जिंदगी के अनुभवों से निखरी।
कॉलेज के दिनों में उन्हें एक लड़की से लगाव हो गया था। वह लड़की उनके आगे की पंक्ति में बैठा करती थी। फिर एक दिन कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर खबर मिली कि एक दुर्घटना में उसकी मौत हो गई। यह खबर निदा के लिए गहरा सदमा थी। उनके भीतर जो दर्द उमड़ा, उसे बयां करने के लिए उनके पास शब्द ही नहीं थे। यही एहसास उन्हें अपनी भावनाओं को समझने और उन्हें अल्फाज देने की तरफ ले गया।
कहा जाता है कि एक सुबह निदा फाजली मंदिर के पास से गुजर रहे थे। वहां उन्होंने सूरदास का भजन सुना— 'मधुबन तुम क्यौं रहत हरे?' कृष्ण के वियोग में दुखी राधा और गोपियों की भावनाओं को व्यक्त करने वाला यह भजन उनके दिल में उतर गया। उन्हें लगा कि विरह और बिछड़ने का दर्द केवल उनका निजी अनुभव नहीं है। इसके बाद उन्होंने कबीर, तुलसीदास, सूरदास, मीराबाई और बाबा फरीद जैसे रचनाकारों को पढ़ा। गालिब और मीर की शायरी से भी प्रेरणा ली। इन सबका असर उनके लेखन पर दिखाई दिया। उन्होंने ऐसी भाषा में लिखना शुरू किया, जिसे आम आदमी भी आसानी से समझ सके और अपने जीवन से जोड़ सके।
देश के बंटवारे के समय निदा फाजली के माता-पिता पाकिस्तान चले गए लेकिन उन्होंने भारत में ही रहने का फैसला किया। परिवार से दूर रहकर अपनी जिंदगी बनाना आसान नहीं था। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी और लेखन के क्षेत्र में संघर्ष किया।
साल 1964 में वह बंबई चले गए। वहां उन्होंने पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी पहचान बनने लगी और 1969 में उनका उर्दू कविता संग्रह भी प्रकाशित हुआ। उनकी शायरी में बनावट नहीं थी। वे जिंदगी को जैसा देखते और महसूस करते थे, उसे वैसे ही शब्दों में उतार देते थे।
निदा फाजली ने साहित्य के साथ हिंदी फिल्मों में भी अपनी अलग पहचान बनाई। फिल्म रजिया सुल्तान से उनके फिल्मी गीतों के सफर की शुरुआत हुई। इसके बाद उन्होंने कई यादगार गीत लिखे। फिल्म आहिस्ता-आहिस्ता का गीत 'कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता' और सरफरोश का 'होश वालों को खबर क्या, बेखुदी क्या चीज है' आज भी लोगों के बीच लोकप्रिय हैं।
उन्होंने अपने अनुभवों और भावनाओं को शायरी में ढाला लेकिन उनकी रचनाएं केवल उनकी अपनी कहानी बनकर नहीं रह गईं। वे लाखों लोगों के दिलों की आवाज बन गईं।
--आईएएनएस
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