जैसलमेर में दादागुरुदेव चादर महोत्सव के तहत भव्य वरघोड़ा निकाला गया
राजस्थान की स्वर्णनगरी जैसलमेर में आयोजित तीन दिवसीय दादागुरुदेव चादर महोत्सव का शुक्रवार का दिन भक्ति और आस्था से ओतप्रोत रहा। इस दिन सुबह ऐतिहासिक सोनार दुर्ग स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर के ज्ञान भंडार से दादा गुरुदेव जिनदत्तसुरी जी महाराज की पवित्र चादर को विधिवत पूजन और अर्चना के साथ बाहर लाया गया।
जानकारी के अनुसार, यह चादर लगभग 150 वर्षों बाद मंदिर के ज्ञान भंडार से बाहर लाई गई है। 872 वर्ष से अधिक प्राचीन यह चादर जैन समुदाय में विशेष धार्मिक महत्व रखती है और इसे अत्यंत श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।
इस अवसर पर मंदिर परिसर और आसपास के इलाके में श्रद्धालुओं और भक्तों की भारी भीड़ जुटी। भव्य वरघोड़े में शामिल लोगों ने पारंपरिक जैन वेशभूषा धारण की और धार्मिक गीतों, भजनों और मंत्रों के साथ चादर का सत्कार और स्वागत किया।
मंदिर प्रशासन और आयोजकों ने बताया कि इस चादर महोत्सव का उद्देश्य जैन धर्म की धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना और नई पीढ़ी तक इसे पहुँचाना है। चादर का बाहर लाया जाना जैन धर्म के अनुयायियों के लिए गहन आध्यात्मिक अनुभव का अवसर है।
स्थानीय इतिहासकारों और धार्मिक विद्वानों के अनुसार, यह चादर 872 साल से जैन समुदाय की आस्था और श्रद्धा का प्रतीक रही है। इसे निकालने और वरघोड़े में शामिल करने की परंपरा को लंबे समय बाद पुनः जीवित किया गया है।
भव्य वरघोड़े में शामिल भक्तों ने चादर के चारों ओर सांस्कृतिक प्रदर्शन और भजन-संगीत के माध्यम से महोत्सव का आनंद लिया। इस दौरान उपस्थित लोगों ने धार्मिक ज्ञान और संदेश का आदान-प्रदान किया और जैन धर्म की परंपराओं का सम्मान किया।
मंदिर समिति के अध्यक्ष ने कहा कि चादर महोत्सव का आयोजन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि जैसलमेर के सांस्कृतिक पर्यटन के लिए भी अहम योगदान देता है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के आयोजन स्थानीय युवाओं और समाज के अन्य वर्गों को जैन धर्म की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत से जोड़ने का अवसर प्रदान करते हैं।
भक्तों और श्रद्धालुओं ने इस दिन को जीवनभर यादगार बनाने के लिए विशेष पूजा-अर्चना और दान पुण्य किया। उन्होंने कहा कि यह चादर महोत्सव उनके लिए आध्यात्मिक अनुभव और आस्था की पुष्टि का प्रतीक है।
इस प्रकार, जैसलमेर में तीन दिवसीय दादागुरुदेव चादर महोत्सव के तहत शुक्रवार को निकाले गए भव्य वरघोड़े और पवित्र चादर ने पूरे शहर में धार्मिक उत्सव और श्रद्धा का माहौल बना दिया। आयोजन ने जैन धर्म की प्राचीन परंपराओं को जीवित रखा और समाज में धार्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना को बल प्रदान किया।