×

11वीं शताब्दी में बना भगवान जगन्नाथ का अद्भुत मंदिर, जहां बारिश की बूंदों में दिखता है भविष्य, कहलाता है 'मॉनसून मंदिर'

 

कानपुर, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। भारत को मंदिरों का देश कहा जाता है। देश में कई मंदिर हैं, जिस पर भक्तों की गहरी आस्था है और इनसे कुछ विशेष रहस्य भी जुड़े हैं। ऐसा ही एक रहस्यमयी प्राचीन मंदिर उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्थित है। भगवान जगन्नाथ को समर्पित इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि बारिश शुरू होने से कुछ दिन पहले ही मंदिर की छत से खुद-ब-खुद पानी की बूंदें टपकने लगती हैं।

कानपुर जिले में स्थित भगवान जगन्नाथ का प्राचीन मंदिर ठीक ऐसे ही चमत्कार से भरा पड़ा है। इसे लोकप्रिय रूप से ‘मॉनसून मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर कानपुर जनपद के भीतरगांव (भियातरगांव) विकासखंड मुख्यालय से मात्र तीन किलोमीटर दूर बेहता (बेंहटा) गांव में स्थित है। मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि मानसून की बारिश से लगभग एक सप्ताह पहले इसकी छत से बारिश की बूंदें टपकने लगती हैं। स्थानीय किसान सदियों से इस संकेत पर भरोसा करते आए हैं और अपनी फसलों की तैयारी इसी के अनुसार करते हैं।

सदियों पुराना यह मंदिर भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा को समर्पित है। मंदिर के गर्भगृह में लगभग 6-7 फीट ऊंची काले पत्थर की भव्य प्रतिमा स्थापित है, जो दर्शन करने वालों को मंत्रमुग्ध कर देती है।

प्रचलित मान्यता और लोक कथा के अनुसार, स्थानीय किसानों में यह अटूट विश्वास है कि यह मंदिर मौसम की भविष्यवाणी करता है। पुराने समय में जब आधुनिक मौसम पूर्वानुमान नहीं थे, तब किसान मंदिर की छत पर टपकती बूंदों को देखकर बारिश की तीव्रता और समय का अनुमान लगाते थे। बूंदों की संख्या और आकार से वे समझ जाते थे कि इस बार मानसून कैसा रहेगा। आश्चर्य की बात यह है कि जैसे ही असली बारिश शुरू होती, मंदिर की छत रहस्यमय तरीके से सूख जाती थी। आज भी आसपास के गांवों के किसान फसल बोने और तैयारियों के लिए इस ‘मानसून मंदिर’ के संकेत पर भरोसा करते हैं। कई लोग मानते हैं कि मंदिर की पवित्र दीवारों के अंदर की गई प्रार्थनाएं पूरी होती हैं।

मंदिर की वास्तुकला भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। इसका आकार बौद्ध स्तूप की तरह घुमावदार है। मुख्य ढांचा भव्य रथ जैसा लगता है, जबकि चारों ओर की दीवारें कमल की कोमल पंखुड़ियों जैसी बनी हैं। मंदिर के शीर्ष पर आठ धातुओं से बना नीला चक्र लगा है, जिस पर केसरिया ध्वज फहराता रहता है। यह चक्र बिजली का सुचालक भी है, जिसकी वजह से आंधी-तूफान में मंदिर सदियों से सुरक्षित बचा हुआ है। पुरातत्व विशेषज्ञों ने कई बार सर्वेक्षण किए, लेकिन मंदिर के मूल निर्माण का सटीक समय अभी तक पता नहीं चल सका है। केवल इतना ज्ञात है कि इसका अंतिम जीर्णोद्धार 11वीं शताब्दी में हुआ था। इससे पहले का इतिहास आज भी रहस्य बना हुआ है।

मंदिर तक सड़क मार्ग से कानपुर शहर से आसानी से पहुंचा जा सकता है। भीतरगांव ब्लॉक मुख्यालय से सिर्फ 3 किलोमीटर दूर बेहता गांव है। निजी कार, टैक्सी या ऑटो उपलब्ध रहती हैं। वहीं, निकटतम रेलवे स्टेशन कानपुर सेंट्रल है। वहां से बस या टैक्सी लेकर मंदिर पहुंच सकते हैं। कानपुर का चकेरी एयरपोर्ट सबसे नजदीक है। एयरपोर्ट से सड़क मार्ग द्वारा मंदिर आसानी से पहुंचा जा सकता है।

यूं तो मंदिर में साल भर भक्तों की भीड़ होती है। लेकिन जन्माष्टमी के आसपास (अगस्त-सितंबर) जब मंदिर उत्सवों से गुलजार रहता है। मानसून से ठीक पहले (जून की शुरुआत) भी यहां पहुंचा जा सकता है। मंदिर दर्शन के बाद पास ही स्थित भीतरगांव मंदिर (देश का सबसे बड़ा और पुराना ईंटों का मंदिर) भी स्थित है। यह गुप्त काल की स्थापत्य कला का शानदार उदाहरण है।

--आईएएनएस

एमटी/डीएससी