×

11 साल में जन आंदोलन बना 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ', पीएम मोदी के 'गुजरात मॉडल' से बदली बेटियों की शिक्षा की तस्वीर

 

नई दिल्ली, 22 जनवरी (आईएएनएस)। भारत में 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान आज एक जन आंदोलन बन चुका है। 11 साल पहले 22 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान की शुरुआत की। राष्ट्रीय स्तर पर अभियान के 11 साल पूरे होने पर 'मोदी आर्काइव' ने लिखा है कि यह लड़कियों की शिक्षा और सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक ऐतिहासिक प्रयास था।

'मोदी आर्काइव' ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में लिखा, "'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' के राष्ट्रीय आंदोलन बनने से पहले इसका खाका गुजरात में तैयार किया गया था। खराब महिला साक्षरता से लगभग सार्वभौमिक नामांकन तक, बड़े पैमाने पर स्कूल छोड़ने से लेकर रिकॉर्ड संख्या में बच्चों के स्कूल में बने रहने तक, उपेक्षित स्कूलों से लेकर सम्मान-पहला इंफ्रास्ट्रक्चर तक, गुजरात के 'कन्या केलवणी' और 'शाला प्रवेशोत्सव' ने संख्या बदलने से पहले मानसिकता बदली।"

'मोदी आर्काइव' की ओर से शेयर किए गए वीडियो में कहा गया है, "साल 2001 में जब नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला, तब सामने एक कठोर सच्चाई थी। बेटियों की शिक्षा उपेक्षित थी। कानून थे, लेकिन समाज की सोच नहीं बदली थी। उस समय महिला साक्षरता 57.80 प्रतिशत थी। 38.92 बेटियां स्कूल बीच में छोड़ चुकी थीं। 42 हजार स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय तक नहीं थे।"

इसमें बताया गया, "मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में कदम उठाने का संकल्प लिया। उन्होंने 'कन्या केलवणी योजना' और 'शाला प्रवेशोत्सव' की शुरुआत की। इसका उद्देश्य माता-पिता में जागरुकता लाने और पूरे समाज की सोच में बदलाव लाना था। झुलसा देने वाली गर्मियों में सीएम रहते नरेंद्र मोदी गांव-गांव गए। मुख्यमंत्री, उनका मंत्रिमंडल और वरिष्ठ अधिकारी हर साल भीषण गर्मी में तीन दिनों के लिए हजारों गांवों में जाते थे। 119 आईएएस, 94 आईपीएस और 68 आईएफएस समेत कुल 634 वरिष्ठ अधिकारी हर साल तीन दिन के लिए सब कुछ छोड़कर सिर्फ एक काम करते थे। वे 18 हजार से ज्यादा गांवों में जाकर बेटियों को स्कूल तक पहुंचाते थे।"

'मोदी आर्काइव' के अनुसार, इस यात्रा में मुख्यमंत्री और अधिकारी घर-घर जाते थे। उनका एक ही मिशन था, 'हर लड़की को स्कूल लाना।' मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी गांव-गांव जाकर माता-पिता के साथ बैठे, हाथ जोड़े और अनुरोध किया, 'कृपया अपनी बेटियों को स्कूल भेजें। आपके भविष्य और हमारे समाज के लिए।' इसके अलावा, सिर्फ बेटियों के लिए 7 साल में 42,371 शौचालय परिसर बनाए गए। 58,463 नई कक्षाएं बनीं और 22,758 स्कूलों में बिजली पहुंची।

उसी समय में मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए नरेंद्र मोदी ने अपने सभी गिफ्ट नीलाम किए और अपनी पूरी सैलरी को डोनेट किया। इसके बाद स्कूलों में बच्चियों का दाखिला 'शाला प्रवेशोत्सव' बना। ढोल बजे, सजी हुई रथ यात्राएं निकलीं और पूरे गांव ने जश्न मनाया, जब बेटियां क्लासरूम में पहुंचीं। 'कन्या केलवणी' के जरिए बेटियों को आर्थिक सहायता दी गई, ताकि वे स्कूल छोड़ने पर मजबूर न हों। योजना के तहत 55,181 लड़कियों को मदद मिली। 8वीं कक्षा तक लड़कियों के लिए विद्या लक्ष्मी बॉन्ड शुरू किए गए। मेडिकल और इंजीनियरिंग की छात्राओं को टैबलेट्स दिए गए। कुल 3,545 लड़कियों को टैबलेट्स बांटे गए। सरस्वती साइकिल योजना के जरिए लाखों लड़कियों को साइकिल दी गईं।

'मोदी आर्काइव' के अनुसार, इसका असर यह हुआ कि महिला साक्षरता 57.80 प्रतिशत से बढ़कर 70.73 प्रतिशत तक पहुंच गई। स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या 38.92 प्रतिशत से घटकर 7.08 प्रतिशत पर आ गई। इस तरह राष्ट्रीय नारा बनने से पहले 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' पहले से ही एक सफल जमीनी आंदोलन था।

--आईएएनएस

डीसीएच/