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107 वर्षीया धनी देवी ने मृत्यु के बाद भी दिया जीवन का संदेश, परिजनों ने निभाई अंतिम इच्छा, हुआ देहदान

 

राजस्थान के बाड़मेर जिले से मानवता और प्रेरणा से जुड़ी एक भावुक खबर सामने आई है। 107 वर्षीय धनी देवी के निधन के बाद उनके परिजनों ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए देहदान कर समाज के सामने मिसाल पेश की है। अब उनकी देह Barmer Medical College में मेडिकल छात्रों के अध्ययन और रिसर्च के काम आएगी।

जानकारी के अनुसार धनी देवी ने जीवनकाल में ही देहदान की इच्छा जताई थी। उन्होंने चाहा था कि मृत्यु के बाद भी उनका शरीर समाज और चिकित्सा शिक्षा के काम आए। उनके निधन के बाद परिवार ने भावनात्मक क्षणों के बीच उनकी इस अंतिम इच्छा को पूरा करने का फैसला लिया और पूरे सम्मान के साथ देहदान की प्रक्रिया पूरी की गई।

परिजनों का कहना है कि धनी देवी हमेशा सेवा, परोपकार और समाजहित की भावना से प्रेरित रहीं। उन्होंने जीवनभर लोगों को मदद और मानवता का संदेश दिया और मृत्यु के बाद भी उसी संदेश को आगे बढ़ाया। परिवार ने कहा कि यह केवल देहदान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा है।

धनी देवी की देह बाड़मेर मेडिकल कॉलेज को सौंपी गई, जहां अब मेडिकल छात्र एनाटॉमी और रिसर्च के लिए इसका उपयोग कर सकेंगे। चिकित्सा शिक्षा में देहदान को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे छात्रों को मानव शरीर की संरचना को समझने और बेहतर चिकित्सक बनने में मदद मिलती है।

मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने भी इस देहदान को सराहनीय कदम बताया। अधिकारियों के अनुसार इस तरह के दान से चिकित्सा शिक्षा को मजबूती मिलती है और छात्रों को व्यावहारिक अध्ययन का अवसर मिलता है। साथ ही यह समाज में अंगदान और देहदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

107 वर्ष की आयु में धनी देवी का यह निर्णय लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया है। आमतौर पर लोग मृत्यु के बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन धनी देवी और उनके परिवार ने सामाजिक सरोकार को महत्व देते हुए नई सोच का परिचय दिया है।

समाजसेवियों और चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों ने भी इस पहल की सराहना की है। उनका कहना है कि देहदान केवल एक वैज्ञानिक योगदान नहीं, बल्कि मानवता के प्रति समर्पण का प्रतीक है। ऐसे उदाहरण समाज में सकारात्मक बदलाव लाने का काम करते हैं।

बाड़मेर की धनी देवी ने अपने जीवन के 107 वर्षों में जो संदेश दिया, वह मृत्यु के बाद भी जीवित रहेगा। उनका देहदान यह साबित करता है कि इंसान अपने जाने के बाद भी समाज के काम आ सकता है। यह घटना न सिर्फ बाड़मेर बल्कि पूरे राजस्थान के लिए प्रेरणा का विषय बन गई है।