Swami Vivekananda Famous Books: स्वामी विवेकानंद की इन मशहूर किताबों में मिलेगा जीवन का दर्शन और असली मायने
दुनियाभर में स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)का जन्मदिन (12 जनवरी) को युवा दिवस (Yuva Diwas) के तौर पर मनाया जाता है. स्वामी विवेकानंद जी को एक सन्यासी, गुरू, आध्यात्मिक नेता (Spiritual Leader), धर्मगुरू, जैसे कई नामों से जाना जाता है. कोलकाता के एक सामान्य परिवार में जन्में नरेंद्रनाथ दत्त युवा होते-होते पूरी तरह आध्यात्म में रम गए और जब महान गुरु रामकृष्ण परमहंस (Ramakrishna Paramahamsa) का उन्हें सानिध्य मिला, तो नरेंद्र नाथ से विवेकानंद बनने की यात्रा का प्रारंभ हुई. भारत (India) देश के वेदांत ज्ञान को दुनिया के सामने लाने का कार्य जिस सुंदर तरीके से स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में हुई धर्म संसद में किया, उससे भला कौन परिचित नहीं है.
स्वामी विवेकानंद अपने विचारों की वजह से सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में पहचाने गए. देश विदेश की यात्रा के दौरान उनके द्वारा दिए गए भाषणों का संकलन उनकी कई किताबों में मिलता है. स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखित किताबों की अगर बात करें तो, उनमें राजयोग, कर्मयोग, भक्ति योग, ज्ञानयोग, माई मास्टर, लेक्चर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा प्रमुख हैं. आप भी जानिए स्वामी विवेकानंद जी की इन किताबों के बारे में.....
राजयोग (1896)
“राजयोग (Raja Yoga)” स्वामी विवेकानंद की सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों में से एक है. यह किताब सन् 1896 ई. के जुलाई महीने में प्रकाशित हुई थी. राजयोग सभी योगों का राजा कहलाता है क्योंकि इसमें प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ सामग्री अवश्य मिल जाती है. राजयोग में महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का वर्णन आता है. राजयोग का विषय चित्तवृत्तियों (mood swings) को नियंत्रित करना है. योग को सबसे पहले वैश्विक स्तर पर ले जाने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को ही दिया जाता है. इस पुस्तक में स्वामी विवेकानन्द ने राज योग या अष्टांग योग की न सिर्फ़ व्याख्या की है, बल्कि इस पथ पर चलने के लिए आवश्यक साधनों और परिणामों की भी गंभीर चर्चा है. योग के विषय में इसे एक प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है.
कर्मयोग (1896)
‘कर्मयोग (Karma Yoga)’ स्वामी विवेकानंद की विख्यात पुस्तक है. इस किताब का हर अध्याय स्वामी जी के व्याख्यानों का लिपिबद्ध रूप है. इस पुस्तक में स्वामी विवेकानंद द्वारा दिसंबर 1895 से जनवरी 1896 के बीच दिए भाषणों का संकलन है. इस पुस्तक में कर्म के चरित्र पर प्रभाव के बारे में बताया गया है. कर्म शब्द ‘कृ’ धातु से निकला है, कृ धातु का अर्थ है करना. जो कुछ किया जाता है, वही कर्म है. इस शब्द का परिभाषिक अर्थ शब्द कर्मफल भी होता है. स्वामी जी के अनुसार कर्मयोग वस्तुतः निःस्वार्थपरता और सत्कर्म द्वारा मुक्ति लाभ करने की एक विशिष्ट प्रणाली है. स्वामी जी कहते हैं कि बिना किसी निजी स्वार्थ के लोककल्याण के लिए अपना कर्तव्य सर्वश्रेष्ठ तरीके से करना ही कर्म योग है. इस किताब में कर्म योग के आदर्श को प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं, “आदर्श पुरुष तो वे हैं, जो परम शान्ति एवं स्थिरता के बीच भी तीव्र कर्म का, और प्रबल कर्मशीलता के बीच भी मरुस्थल की शान्ति एवं निस्तब्धता का अनुभव करते हैं.
भक्ति योग (1896)
‘भक्तियोग (Bhakti Yoga)’ में स्वामी जी ने भक्ति के अलग-अलग प्रकार के साधनों का विवेचन अनेकानेक धर्मग्रथों और आत्मानुभूति के आधार पर किया है. इस पुस्तक में स्वामी जी ने भक्ति के लक्षण का वर्णन करते हुए लिखा है, निष्कपट भाव से ईश्वर की खोज को भक्तियोग कहते हैं. इस खोज का आरम्भ मध्य और अंत प्रेम में होता है. स्वामी जी कहते हैं कि भक्ति कर्म से श्रेष्ठ है और ज्ञान तथा योग से भी उच्च है. क्योंकि इन सबका कोई ना कोई लक्ष्य है, लेकिन भक्ति स्वयं ही साध्य और साधन स्वरूप है.
ज्ञानयोग (1899)
‘ज्ञानयोग (Jnana Yoga)’ स्वामी विवेकानन्द द्वारा वेदान्त पर दिये गये भाषाणों का संग्रह है. इन भाषणों में स्वामी विवेकानंद ने वेदान्त के गूढ़ तत्वों की ऐसे सरल, स्पष्ट और सुन्दर रूप से विवेचना की है कि आजकल के शिक्षित जनसमुदाय को ये खूब भा जाते हैं. उन्होंने इस किताब में ये दर्शाया है कि वैयक्तिक (Personal) और सामुदायिक (Community) जीवन-गठन (Life Formation) में वेदान्त किस प्रकार सहायक होता है. मनुष्य के विचारों का उच्चतम स्तर वेदान्त है और इसी की ओर संसार की समस्त विचारधाराएं शनैःशनैः (gradually) प्रवाहित हो रही हैं. अन्त में वे सब वेदान्त में ही लीन होंगी.
माई मास्टर (1901)
स्वामी विवेकानंद 1899 में दूसरी बार पश्चिमी देशों की यात्रा पर गए थे. इस दौरान स्वामी जी ने अमेरिका और इंग्लैंड में कुछ उल्लेखनीय भाषण दिए. इन व्याख्यानों में उन्होंने भारतीय इतिहास, हिंदू पौराणिक पात्रों से लेकर मानव मन तक कई विषयों को शामिल किया. माई मास्टर (My Master) किताब को 1901 में न्यूयॉर्क और इंग्लैंड में विवेकानंद द्वारा दिए गए दो भाषणों से संकलित किया गया था. माई मास्टर ही एकमात्र ऐसी पुस्तक है, जिसमें विवेकानंद ने अपने गुरु रामकृष्ण के बारे में कुछ बताया था. इसमें स्वामी जी कहते हैं.’…अगर कभी सत्य का एक शब्द, आध्यात्मिकता का एक शब्द है जो मैंने दुनिया में कहीं भी बोला है, तो मैं अपने गुरु के लिए ऋणी हूं; गलतियां सिर्फ मेरी हैं.’
लेक्चर्स फ्रॉम कोलंबो टू अल्मोड़ा (1897)
स्वामी विवेकानंद पश्चिमी देशों से भ्रमण के बाद 15 जनवरी 1897 को कोलंबो, ब्रिटिश सीलोन (अब श्रीलंका) पहुंचे, चार दिनों तक कोलंबो में रहने के बाद वे 20 जनवरी को मद्रास के रास्ते कलकत्ता पहुंचे. 1897 और 1899 के बीच स्वामी जी ने बड़े पैमाने पर यात्रा की और भारतीय राज्यों का दौरा किया जिनमें उत्तर प्रदेश, पंजाब और कश्मीर शामिल थे. 6 मई 1897 को विवेकानंद ने अल्मोड़ा (तब के यूनाइटेड प्रोवेंस और आज के उत्तराखंड) की यात्रा शुरू की और 19 जून को वह अल्मोड़ा पहुंचें. उन्होंने इस अवधि में अलग-अलग जगहों पर 17 व्याख्यान दिए, जिन्हें एक पुस्तक में संकलित किया गया था, जिसका नाम है कोलंबो से अल्मोड़ा के लिए व्याख्यान (Lectures from Colombo to Almora).