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Sumitranandan Pant Poetry: ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ कहे जाने वाले सुमित्रानंदन पंत की अब तक सबसे मशहूर कविताएं

 

हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को हुआ था. खूबसूरत अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी ग्राम में जन्में सुमित्रानंदन का झुकाव प्रकृति सौंदर्य की तरफ अधिक था. यही कारण है कि उनकी रचनाओं को पढ़ कर लोग ख्यालों में ही ऐसा महसूस करने लगते हैं, जैसे कि वे प्रकृति की गोद में ही हों. तो आईये आज पढ़ें उनकी लिखी बेहद सुंदर कविताओं की चुनिंदा पंक्तियां...

महात्मा जी के प्रति

निर्वाणोन्मुख आदर्शों के अंतिम दीप शिखोदय!–
जिनकी ज्योति छटा के क्षण से प्लावित आज दिगंचल,–

गत आदर्शों का अभिभव ही मानव आत्मा की जय,
अत: पराजय आज तुम्हारी जय से चिर लोकोज्वल!

मानव आत्मा के प्रतीक! आदर्शों से तुम ऊपर,
निज उद्देश्यों से महान, निज यश से विशद, चिरंतन;

सिद्ध नहीं, तुम लोक सिद्धि के साधक बने महत्तर,
विजित आज तुम नर वरेण्य, गणजन विजयी साधारण!

युग युग की संस्कृतियों का चुन तुमने सार सनातन
 नव संस्कृति का शिलान्यास करना चाहा भव शुभकर

साम्राज्यों ने ठुकरा दिया युगों का वैभव पाहन–
पदाघात से मोह मुक्त हो गया आज जन अन्तर!

दलित देश के दुर्दम नेता, हे ध्रुव, धीर, धुरंधर,
आत्म शक्ति से दिया जाति शव को तुमने जीवन बल;

विश्व सभ्यता का होना था नखशिख नव रूपांतर,
राम राज्य का स्वप्न तुम्हारा हुआ न यों ही निष्फल!

विकसित व्यक्तिवाद के मूल्यों का विनाश था निश्चय,
वृद्ध विश्व सामंत काल का था केवल जड़ खँडहर!

हे भारत के हृदय! तुम्हारे साथ आज नि:संशय
 चूर्ण हो गया विगत सांस्कृतिक हृदय जगत का जर्जर!

गत संस्कृतियों का आदर्शों का था नियत पराभव,
वर्ग व्यक्ति की आत्मा पर थे सौध धाम, जिनके स्थित;

तोड़ युगों के स्वर्ण पाश अब मुक्त हो रहा मानव,
जन मानवता की भव संस्कृति आज हो रही निर्मित!

किए प्रयोग नीति सत्यों के तुमने जन जीवन पर,
भावादर्श न सिद्ध कर सके सामूहिक-जीवन-हित;

अधोमूल अश्वत्थ विश्व, शाखाएँ संस्कृतियाँ वर,
वस्तु विभव पर ही जनगण का भाव विभव अवलंबित!

वस्तु सत्य का करते भी तुम जग में यदि आवाहन,
सब से पहले विमुख तुम्हारे होता निर्धन भारत;

मध्य युगों की नैतिकता में पोषित शोषित-जनगण
 बिना भाव-स्वप्नों को परखे कब हो सकते जाग्रत?

सफल तुम्हारा सत्यान्वेषण, मानव सत्यान्वेषक!
धर्म, नीति के मान अचिर सब, अचिर शास्त्र, दर्शन मत,

शासन जन गण तंत्र अचिर-युग स्थितियाँ जिनकी प्रेषक,
मानव गुण, भव रूप नाम होते परिवर्तित युगपत!

पूर्ण पुरुष, विकसित मानव तुम, जीवन सिद्ध अहिंसक,
मुक्त-हुए-तुम-मुक्त-हुए-जन, हे जग वंद्य महात्मन्!

देख रहे मानव भविष्य तुम मनश्चक्षु बन अपलक,
धन्य, तुम्हारे श्री चरणों से धरा आज चिर पावन!

– सुमित्रानंदन पंत 

बापू के प्रति

तुम मांस-हीन, तुम रक्त-हीन,
हे अस्थि-शेष! तुम अस्थि-हीन,

तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल,
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन

तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्य लीन;

आधार अमर, होगी जिसपर
 भावी की संस्कृति समासीन!

 तुम मांस, तुम्ही हो रक्त-अस्थि,–
 निर्मित जिनसे नवयुग का तन,

 तुम धन्य! तुम्हारा नि:स्व-त्याग
 है विश्व-भोग का वर साधन।

 इस भस्म-काम तन की रज से
 जग पूर्ण-काम नव जग-जीवन

 बीनेगा सत्य-अहिंसा के
 ताने-बानों से मानवपन!

सदियों का दैन्य-तिमिर तूम,
धुन तुमने कात प्रकाश-सूत,

हे नग्न! नग्न-पशुता ढँक दी
 बुन नव संस्कृत मनुजत्व पूत।

 जग पीड़ित छूतों से प्रभूत,
छू अमित स्पर्श से, हे अछूत!

तुमने पावन कर, मुक्त किये
 मृत संस्कृतियों के विकृत भूत!

 सुख-भोग खोजने आते सब,
 आये तुम करने सत्य खोज,

 जग की मिट्टी के पुतले जन,
 तुम आत्मा के, मन के मनोज!

 जड़ता, हिंसा, स्पर्धा में भर
 चेतना, अहिंसा, नम्र-ओज,

 पशुता का पंकज बना दिया
 तुमने मानवता का सरोज!

पशु-बल की कारा से जग को
 दिखलाई आत्मा की विमुक्ति,

विद्वेष, घृणा से लड़ने को
 सिखलाई दुर्जय प्रेम-युक्ति;

वर श्रम-प्रसूति से की कृतार्थ
 तुमने विचार-परिणीत उक्ति,

विश्वानुरक्त हे अनासक्त!
सर्वस्व-त्याग को बना भुक्ति!

 सहयोग सिखा शासित-जन को
 शासन का दुर्वह हरा भार,

 होकर निरस्त्र, सत्याग्रह से
 रोका मिथ्या का बल-प्रहार:

 बहु भेद-विग्रहों में खोई
 ली जीर्ण जाति क्षय से उबार,

 तुमने प्रकाश को कह प्रकाश,
 औ अन्धकार को अन्धकार।

 उर के चरखे में कात सूक्ष्म
 युग-युग का विषय-जनित विषाद,

गुंजित कर दिया गगन जग का
 भर तुमने आत्मा का निनाद।

 रँग-रँग खद्दर के सूत्रों में
 नव-जीवन-आशा, स्पृह्यालाद,

मानवी-कला के सूत्रधार!
हर लिया यन्त्र-कौशल-प्रवाद।

 जड़वाद जर्जरित जग में तुम
 अवतरित हुए आत्मा महान,

 यन्त्राभिभूत जग में करने
 मानव-जीवन का परित्राण;

 बहु छाया-बिम्बों में खोया
 पाने व्यक्तित्व प्रकाशवान,

 फिर रक्त-माँस प्रतिमाओं में
 फूँकने सत्य से अमर प्राण!

संसार छोड़ कर ग्रहण किया
 नर-जीवन का परमार्थ-सार,

अपवाद बने, मानवता के
 ध्रुव नियमों का करने प्रचार;

हो सार्वजनिकता जयी, अजित!
तुमने निजत्व निज दिया हार,

लौकिकता को जीवित रखने
 तुम हुए अलौकिक, हे उदार!

 मंगल-शशि-लोलुप मानव थ
 विस्मित ब्रह्मांड-परिधि विलोक

 तुम केन्द्र खोजने आये त

 सब में व्यापक, गत राग-शोक;
 पशु-पक्षी-पुष्पों से प्रेरित

 उद्दाम-काम जन-क्रान्ति रोक,
 जीवन-इच्छा को आत्मा के

 वश में रख, शासित किए लोक।
 था व्याप्त दिशावधि ध्वान्त भ्रान्त

 इतिहास विश्व-उद्भव प्रमाण,
बहु-हेतु, बुद्धि, जड़ वस्तु-वाद

 मानव-संस्कृति के बने प्राण;

थे राष्ट्र, अर्थ, जन, साम्य-वा
 छल सभ्य-जगत के शिष्ट-मान,

भू पर रहते थे मनुज नहीं,
बहु रूढि-रीति प्रेतों-समान–

 तुम विश्व मंच पर हुए उदित
 बन जग-जीवन के सूत्रधार,

 पट पर पट उठा दिए मन से
 कर नव चरित्र का नवोद्धार;

 आत्मा को विषयाधार बना,
दिशि-पल के दृश्यों को सँवार,

 गा-गा–एकोहं बहु स्याम,
 हर लिए भेद, भव-भीति-भार!

एकता इष्ट निर्देश किया,
जग खोज रहा था जब समता,

अन्तर-शासन चिर राम-राज्य,
औ’ बाह्य, आत्महन-अक्षमता;

हों कर्म-निरत जन, राग-विरत
रति-विरति-व्यतिक्रम भ्रम-ममता,

प्रतिक्रिया-क्रिया साधन-अवयव,
है सत्य सिद्ध, गति-यति-क्षमता।

 ये राज्य, प्रजा, जन, साम्य-तन्त्र
 शासन-चालन के कृतक यान,

 मानस, मानुषी, विकास-शास्त्र
 हैं तुलनात्मक, सापेक्ष ज्ञान;

 भौतिक विज्ञानों की प्रसूति
 जीवन-उपकरण-चयन-प्रधान,

 मथ सूक्ष्म-स्थूल जग, बोले तुम–
 मानव मानवता का विधान!

साम्राज्यवाद था कंस, बन्दिनी
 मानवता पशु-बलाक्रान्त,

शृंखला दासता, प्रहरी बहु

 निर्मम शासन-पद शक्ति-भ्रान्त;
कारा-गृह में दे दिव्य जन्म

 मानव-आत्मा को मुक्त, कान्त,
जन-शोषण की बढ़ती यमुना

 तुमने की नत-पद-प्रणत, शान्त!
 कारा थी संस्कृति विगत, भित्ति

 बहु धर्म-जाति-गत रूप-नाम,
 बन्दी जग-जीवन, भू-विभक्त,

 विज्ञान-मूढ़ जन प्रकृति-काम;
 आए तुम मुक्त पुरुष, कहने–

 मिथ्या जड़-बन्धन, सत्य राम,
 नानृतं जयति सत्यं, मा भैः

 जय ज्ञान-ज्योति, तुमको प्रणाम!

– सुमित्रानंदन पंत 

अनुभूति

तुम आती हो,
नव अंगों का

 शाश्वत मधु-विभव लुटाती हो।


बजते नि:स्वर नूपुर छम-छम,

सांसों में थमता स्पंदन-क्रम,

तुम आती हो,
अंत:स्थल में

 शोभा ज्वाला लिपटाती हो।
 अपलक रह जाते मनोनयन

 कह पाते मर्म-कथा न वचन,
तुम आती हो,

तंद्रिल मन में,
स्वप्नों के मुकुल खिलाती हो।

 अभिमान अश्रु बनता झर-झर,
अवसाद मुखर रस का निर्झर,

तुम आती हो,
आनंद-शिखर,

प्राणों में ज्वार उठाती हो।
स्वर्णिम प्रकाश में गलता तम,

स्वर्गिक प्रतीति में ढलता श्रम
 तुम आती हो,

जीवन-पथ पर,
सौंदर्य-रस बरसाती हो।

 जगता छाया-वन में मर्मर,
कंप उठती रुद्ध स्पृहा थर-थर,

तुम आती हो,
उर तंत्री में,

स्वर मधुर व्यथा भर जाती हो।

– सुमित्रानंदन पंत

मोह 

छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया,
तोड़ प्रकृति से भी माया,

बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?
भूल अभी से इस जग को!

तज कर तरल-तरंगों को,
इन्द्र-धनुष के रंगों को,

तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा दूँ निज मृग-सा मन?
भूल अभी से इस जग को!

कोयल का वह कोमल-बोल,
मधुकर की वीणा अनमोल,

कह, तब तेरे ही प्रिय-स्वर से कैसे भर लूँ सजनि! श्रवन?
भूल अभी से इस जग को!

ऊषा-सस्मित किसलय-दल,
सुधा रश्मि से उतरा जल,

ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन?
भूल अभी से इस जग को

-सुमित्रानंदन पंत

सांध्य वंदना 

जीवन का श्रम ताप हरो हे!
सुख सुषुमा के मधुर स्वर्ण हे!

सूने जग गृह द्वार भरो हे!
लौटे गृह सब श्रान्त चराचर

 नीरव, तरु अधरों पर मर्मर,
करुणानत निज कर पल्लव से

 विश्व नीड प्रच्छाय करो हे!
उदित शुक्र अब, अस्त भनु बल,

स्तब्ध पवन, नत नयन पद्म दल
 तन्द्रिल पलकों में, निशि के शशि!

सुखद स्वप्न वन कर विचरो हे!

– सुमित्रानंदन पंत