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Rahat Indori Famous Shayari: विश्व प्रसिद्ध शायर राहत इंदौरी साहब की लिखी कुछ सबसे चुनिंदा शायरी 

 

उर्दू भाषा के विश्व प्रसिद्ध शायर, कवि और हिंदी फिल्म गीतकार डॉ. राहत इंदौरी साहब वो कलाकार हैं जो एक खास अंदाज़ से अपनी शेरो शायरी प्रस्तुत करते हैं। यदि उनके लब्ज़ों से मोहब्बत बयां होती है तो समाज का दुख दर्द भी बयां होता है तो कभी व्यवस्था को आईना भी दिखाते हैं। आइये पेश करते हैं  डाॅ. राहत इंदौरी के कुछ चुनिंदा शेर / शायरी...

न हम-सफ़र न किसी हम नशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा है हमीं से निकलेगा

राज़ जो कुछ भी हो इशारों में बता भी देना
हाथ जब उससे मिलाना थोड़ा दबा भी देना

हम अब मकान में ताला लगाने वाले हैं
पता चला है के मेहमान आने वाले हैं

आँखों में पानी रखों, होंठो पे चिंगारी रखो
जिंदा रहना है तो तरकीबे बहुत सारी रखो

तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो

उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई मांगे
जो हो परदेस में वो किससे रज़ाई मांगे

घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है

दोस्ती जब किसी से की जाए
दुश्मनों की भी राय ली जाए

फैसला जो कुछ भी हो, हमें मंजूर होना चाहिए
जंग हो या इश्क हो, भरपूर होना चाहिए

हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ

मैं ने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया
इक समुंदर कह रहा था मुझ को पानी चाहिए

रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है 

जुबां तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे

ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर
जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए

फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो
इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो

इश्क ने गूथें थे जो गजरे नुकीले हो गए
तेरे हाथों में तो ये कंगन भी ढीले हो गए

मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ
यहाँ हमदर्द भी हैं दो-चार मेरे

हर एक हर्फ़ का अंदाज़ बदल रखा हैं
आज से हमने तेरा नाम ग़ज़ल रखा हैं

बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं

मैं आख़िर कौन सा मौसम तुम्हारे नाम कर देता
यहाँ हर एक मौसम को गुज़र जाने की जल्दी थी

किसने दस्तक दी, दिल पे, ये कौन है
आप तो अन्दर हैं, बाहर कौन है

मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे
मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले

मेरा नसीब, मेरे हाथ कट गए वरना
मैं तेरी माँग में सिन्दूर भरने वाला था

कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे
जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे

मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए
और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूं हैं

मैं पर्बतों से लड़ता रहा और चंद लोग
गीली ज़मीन खोद के फ़रहाद हो गए