Marriage Relationship: पति-पत्नी घर का खर्च 50-50 बांटते हैं, तो घर के काम भी क्यों नहीं? नौकरीपेशा महिलाओं की परेशानी पर छिड़ी बहस
आजकल पति-पत्नी दोनों का नौकरी करना और घर का खर्च मिलकर उठाना आम बात हो गई है। कई कपल अपनी कमाई के हिसाब से घर का बजट बनाते हैं और खर्चों को आधा-आधा बांट लेते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह एक-दूसरे का साथ देने का अच्छा तरीका है। लेकिन सवाल यह है कि जब घर का खर्च दोनों बराबर उठाते हैं, तो घर की जिम्मेदारियां भी क्या बराबर बांटी जाती हैं?
जरा सोचिए, अगर पति और पत्नी दोनों सुबह ऑफिस जाते हैं और शाम को घर लौटते हैं, तो क्या दोनों को आराम करने का बराबर मौका मिलता है? कई परिवारों में ऑफिस से लौटने के बाद पति आराम करने लगता है, जबकि पत्नी का दूसरा काम शुरू हो जाता है। उसे खाना बनाना, बच्चों को संभालना, कपड़े और बर्तन साफ करना और घर की दूसरी जिम्मेदारियां पूरी करनी पड़ती हैं। ऐसे में आर्थिक जिम्मेदारी बराबर होने के बावजूद महिला पर काम का बोझ ज्यादा रह जाता है।
इसी मुद्दे को कंटेंट क्रिएटर जॉन सॉन्ज (John Sonmez) ने Better Than Perfect Podcast में उठाया। उन्होंने सवाल किया कि अगर पति-पत्नी कमाई और खर्च बराबर बांट रहे हैं, तो घर के काम और परिवार की जिम्मेदारियां बांटने में भी बराबरी क्यों नहीं होनी चाहिए?
सिर्फ पैसे आधे करना बराबरी नहीं है
रिश्ते में आर्थिक योगदान देना जरूरी है, लेकिन बराबरी का मतलब केवल घर के बिल और खर्चों को आधा-आधा बांटना नहीं है। घर चलाने के लिए पैसों के साथ समय, मेहनत और जिम्मेदारी भी लगती है।अगर पत्नी भी पति की तरह नौकरी करती है और घर के खर्च में बराबर पैसे देती है, तो घर के कामों में भी उसे सहयोग मिलना चाहिए। खाना बनाना, सफाई करना, कपड़े धोना और रोजमर्रा के दूसरे काम किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं होने चाहिए। दोनों को मिलकर यह तय करना चाहिए कि कौन-सा काम किसकी जिम्मेदारी होगा।
ऑफिस से लौटने के बाद भी महिलाओं का काम खत्म नहीं होता
नौकरी करने वाली महिलाओं के लिए दिन कई बार दोहरी जिम्मेदारियों से भरा होता है। सुबह घर के काम निपटाकर ऑफिस जाना और फिर शाम को लौटकर दोबारा घरेलू कामों में लग जाना उनकी दिनचर्या बन जाती है।वहीं, कुछ परिवारों में पुरुष ऑफिस से लौटने के बाद आराम करते हैं, जबकि पत्नी खाना बनाने और घर संभालने में जुट जाती है। इससे महिलाओं को अपने लिए समय निकालना भी मुश्किल हो जाता है।यह समझना जरूरी है कि नौकरी के बाद थकान सिर्फ पुरुषों को नहीं, बल्कि महिलाओं को भी होती है। इसलिए घर के कामों में दोनों की भागीदारी होनी चाहिए।
बच्चों की परवरिश सिर्फ मां की जिम्मेदारी नहीं
बच्चों की देखभाल करना भी परिवार की साझा जिम्मेदारी है। उनकी पढ़ाई, स्कूल की तैयारी, खाना, होमवर्क और रोजमर्रा की जरूरतों का ध्यान रखने में पिता भी बराबर भूमिका निभा सकते हैं।अगर मां नौकरी के साथ बच्चों की हर जिम्मेदारी अकेले निभा रही है, तो उस पर मानसिक और शारीरिक दबाव बढ़ सकता है। पिता भी बच्चों के साथ समय बिताएं, उनकी पढ़ाई में मदद करें और उनकी जरूरतों का ध्यान रखें। इससे मां को राहत मिलेगी और बच्चों को भी माता-पिता दोनों का साथ मिलेगा।
कमाई में बराबरी तो घर की जिम्मेदारियों में क्यों नहीं?
रिश्तों में बराबरी की बात केवल कमाई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अगर दोनों पार्टनर घर के खर्च में योगदान दे रहे हैं, तो दोनों को घर चलाने में भी सहयोग करना चाहिए।ऐसा नहीं है कि हर काम बिल्कुल 50-50 ही बांटना जरूरी है। दोनों अपनी नौकरी के समय, सुविधा और क्षमता के अनुसार जिम्मेदारियां तय कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, एक पार्टनर खाना बना सकता है तो दूसरा बर्तन साफ कर सकता है। इसी तरह बच्चों को स्कूल छोड़ने, बाजार से सामान लाने और घर की सफाई जैसे काम भी आपस में बांटे जा सकते हैं।
रिश्ते में असली बराबरी कैसे आएगी?
एक अच्छे रिश्ते की नींव आपसी समझ, सम्मान और सहयोग पर टिकी होती है। जरूरी नहीं कि दोनों पार्टनर हर दिन बराबर काम करें, लेकिन यह जरूर जरूरी है कि किसी एक पर सारी जिम्मेदारियों का बोझ न पड़े।पति-पत्नी को एक-दूसरे की थकान, काम और जरूरतों को समझना चाहिए। अगर किसी दिन एक पार्टनर ज्यादा व्यस्त है, तो दूसरा उसकी जिम्मेदारियां संभाल सकता है। यही आपसी सहयोग रिश्ते को मजबूत बनाता है।आखिर शादी का मतलब सिर्फ घर का खर्च मिलकर उठाना नहीं, बल्कि घर और जिंदगी की जिम्मेदारियों को भी मिलकर निभाना है। जब दोनों एक-दूसरे का साथ देते हैं, तभी रिश्ते में सही मायने में बराबरी और खुशहाली आती है।