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दोस्त, टीचर और गाइड! कैसे बदला मां-बेटी का बॉन्ड? जानिए ऑनलाइन शॉपिंग से स्मार्ट टेक्नोलॉजी तक का सफर

 

देवयाना अपने कमरे में बैठकर मोबाइल चला रही है। आसपास किताबें और खाने-पीने के पैकेट बिखरे हुए हैं। तभी दरवाजा खुलता है और बालों में कंघी करती हुई उसकी मां रूबी कमरे में आती हैं। उनके हावभाव से साफ है कि उन्हें ऑफिस के लिए देर हो रही है।

रूबी जैसे ही अलमारी से कपड़े निकालकर ड्रेसिंग टेबल पर रखती हैं, देवयाना की नजर उनकी साड़ी पर पड़ती है। वह तुरंत कहती है, "मम्मा, फिर वही पुरानी स्टाइल वाली साड़ी? आपको पसंद है तो पहन लीजिए, लेकिन इसके साथ दूसरा ब्लाउज ट्राई करेंगी तो ज्यादा अच्छा लगेगा। आखिर ड्रेसिंग सेंस भी तो पर्सनैलिटी पर असर डालता है। और मेकअप की चिंता मत करो, वो मैं कर दूंगी। इतनी तारीफ मिलेगी कि पार्लर जाना भूल जाओगी।"

रूबी उसे जल्दी करने के लिए कहती हैं, लेकिन देवयाना अपनी बात पर अड़ी रहती है। वह मां का मेकओवर करने में जुट जाती है। बेटी की जिद को समझते हुए रूबी भी आखिरकार कह देती हैं, "चलो, जो करना है करो, बस जल्दी करना।"

देवयाना कुछ ही देर में मां को तैयार कर देती है और उनके लिए कैब भी बुक कर देती है। बेटी के बड़े हो जाने का एहसास रूबी को भीतर तक छू जाता है। कार में बैठते समय उनकी आंखों में नमी है, लेकिन चेहरे पर मुस्कान है। मानो मन ही मन कह रही हों- बेटी, मेरी जिंदगी का हिस्सा बनने के लिए शुक्रिया।

अब सिर्फ मां ही नहीं, बेटियां भी सिखा रही हैं

समय के साथ मां-बेटी के रिश्ते में भी काफी बदलाव आया है। पहले जहां मां बच्चों को जीवन के तौर-तरीके सिखाती थीं, वहीं आज की बेटियां भी अपनी मां को नई दुनिया से कदमताल करना सिखा रही हैं।

यह बदलाव घरों से लेकर सोशल मीडिया तक नजर आता है। कुछ समय पहले वायरल हुए एक वीडियो में एक बेटी अपनी मां को ऑनलाइन ऑर्डर करने का तरीका समझाती दिखाई दी थी। मां बेटी की हर बात को ध्यान से सुनकर अपनी डायरी में स्टेप-बाय-स्टेप लिख रही थीं, ताकि अगली बार वह खुद ऑनलाइन खरीदारी कर सकें।

मां का इस तरह नई चीजें सीखने के लिए तैयार होना और बेटी का धैर्य के साथ उसे सिखाना, रिश्ते में आए इस बदलाव को बखूबी दिखाता है।

सीखने-सिखाने से मजबूत हो रहा रिश्ता

बेटियां आज अपनी मां को डिजिटल दुनिया से लेकर रोजमर्रा की कई छोटी-बड़ी चीजों तक में मदद कर रही हैं। वहीं, मां भी बिना झिझक बेटियों से नई चीजें सीख रही हैं।

जब कोई मां अपनी बेटी से कुछ नया सीखकर आत्मनिर्भर महसूस करती है, तो उसकी खुशी बेटी के लिए भी किसी उपलब्धि से कम नहीं होती। यह रिश्ता अब सिर्फ मां के मार्गदर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दोनों एक-दूसरे की शिक्षक और विद्यार्थी बनती जा रही हैं।

बेटियों से सीखी डिजिटल दुनिया की समझ

आरती अपनी दोनों बेटियों के बचपन के किस्से सुनाते हुए बताती हैं कि दोनों का स्वभाव एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ दोनों बेटियां उन्हें नए जमाने के हिसाब से ढलने में मदद कर रही हैं।

बड़ी बेटी नेहा उन्हें डिजिटल दुनिया को समझने, ऑनलाइन शॉपिंग करने और दूसरी तकनीकी चीजों में मदद करती है। छोटी बेटी ओजस्विनी भी उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी कई बातें समझाती है।

आरती बताती हैं कि बेटियां जब उन्हें अंग्रेजी सीखने के लिए कहती थीं तो वह पहले उनकी बात को टाल देती थीं। लेकिन बेटियों के लगातार समझाने पर उन्होंने अंग्रेजी के सही उच्चारण और इस्तेमाल पर ध्यान देना शुरू किया। आज वह कई चीजें अपनी बेटियों से सीख रही हैं।

बेटी से सीख रही हैं खुद को हल्का रखना

कनक के दो बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी। वह बेटी सान्वी की समझदारी की तारीफ करते हुए बताती हैं कि उसे अच्छी तरह पता है कि बदलते समय में चीजों को कैसे देखना है।

कनक मानती हैं कि मां के तौर पर बच्चों को सही और गलत के बीच फर्क समझाना उनकी जिम्मेदारी है। कई बार बेटियां मां की बात से नाराज भी हो जाती हैं, लेकिन समय के साथ उन्हें उस सलाह की अहमियत समझ आ सकती है।

वहीं, कनक खुद भी अपनी बेटी से बहुत कुछ सीखती हैं। उनके मुताबिक सान्वी ने उन्हें सबसे जरूरी बात यह सिखाई है कि हर बात को दिल पर नहीं लेना चाहिए। किसी के कुछ कह देने के बाद उसे बार-बार सोचते रहना खुद को परेशान करने जैसा है।

कनक कहती हैं कि जब वह किसी बात को लेकर परेशान होती हैं तो सान्वी उन्हें समझाती है। उसकी सलाह मानने के बाद उन्हें खुद को हल्का महसूस होता है। वह मानती हैं कि स्वभाव बदलना आसान नहीं होता, लेकिन जब कम उम्र में बेटी यह समझ सकती है तो मां भी खुद में बदलाव लाने की कोशिश कर सकती है।

एक-दूसरे की उम्र और दौर को समझना जरूरी

मां-बेटी का रिश्ता जितना खूबसूरत है, उतना ही संवेदनशील भी है। इसे मजबूत बनाए रखने के लिए दोनों तरफ से समझदारी की जरूरत होती है।

मां को चाहिए कि वह हर बात में अपनी राय बेटी पर न थोपे। उसे अपने अनुभवों से सीखने और जीवन के फैसले खुद लेने का मौका देना चाहिए। यह समझना भी जरूरी है कि बेटी जिस दौर में बड़ी हो रही है, वह मां के समय से काफी अलग है।

इसी तरह बेटियों को भी अपनी मां की उम्र, उनके अनुभव और उस दौर को समझने की कोशिश करनी चाहिए जिसमें उन्होंने अपना जीवन जिया है।

जब मां-बेटी एक-दूसरे को बदलने के बजाय समझने और एक-दूसरे से सीखने की कोशिश करती हैं, तो यह रिश्ता और ज्यादा गहरा और मजबूत हो जाता है।