'मर्द बनना सिखाते हैं या...': ईशान खट्टर की इस बात ने खोली रूढ़िवादी सोच की पोल, रिश्तों पर कही बड़ी बात
बचपन से ही कई लड़कों को सिखाया जाता है कि रोना नहीं है, डरना नहीं है और हर परिस्थिति में मजबूत बने रहना है। अगर कोई लड़का अपनी भावनाएं जाहिर करता है, तो कई बार उसे कमजोर समझ लिया जाता है। धीरे-धीरे वह अपनी परेशानी दूसरों से छिपाने लगता है और मन की बात कहने से बचता है। लेकिन क्या सच में मजबूत पुरुष बनने के लिए अपनी भावनाओं को दबाना जरूरी है? बॉलीवुड अभिनेता इशान खट्टर ने मर्दानगी की इसी पारंपरिक सोच पर अपनी राय रखी है। उनकी बात न सिर्फ लड़कों की परवरिश, बल्कि प्यार और शादी जैसे रिश्तों को समझने का एक नया नजरिया भी देती है।
मर्द बनने का मतलब क्या औरतों जैसा न होना है?
इशान खट्टर ने लड़कों की परवरिश से जुड़ी सामाजिक सोच पर सवाल उठाते हुए कहा कि लड़कों को अक्सर यह नहीं सिखाया जाता कि मर्द कैसे बनना है, बल्कि उन्हें यह सिखाया जाता है कि औरतों जैसा नहीं बनना है।
उनकी यह बात उस मानसिकता की ओर इशारा करती है, जिसमें लड़कों को बचपन से ही रोने, डरने या अपनी भावनाएं जाहिर करने से रोका जाता है। लड़का रोए तो उसे कमजोर कहा जाता है और अपनी परेशानी बताए तो उसे मजबूत बनने की सलाह दी जाती है।
हालांकि, अपनी भावनाओं को जाहिर करना कमजोरी नहीं है। जब कोई व्यक्ति बचपन से ही अपनी बात कहने से डरता है, तो बड़े होने के बाद भी उसके लिए अपने जीवनसाथी या पार्टनर के साथ खुलकर बातचीत करना मुश्किल हो सकता है।
सिंगल मदर के साथ परवरिश ने इशान को क्या सिखाया?
इशान खट्टर ने बताया कि उनकी परवरिश उनकी मां ने अकेले की है। उनके जीवन के इस अनुभव ने महिलाओं और उनके नजरिए को समझने में भी भूमिका निभाई।
बचपन में परिवार और आसपास के माहौल से बच्चों को यह सीखने का मौका मिलता है कि दूसरे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए और उनकी भावनाओं को कितनी अहमियत देनी चाहिए।
अगर लड़कों को छोटी उम्र से ही दूसरों की बात सुनने, उनकी परेशानियों को समझने और उनका सम्मान करने की सीख मिले, तो वे बड़े होकर अपने रिश्तों को बेहतर तरीके से निभा सकते हैं। यह समझ सिर्फ प्रेम संबंधों ही नहीं, बल्कि दोस्ती, परिवार और शादीशुदा जिंदगी में भी काम आती है।
पार्टनर की भावनाओं को समझना भी प्यार का हिस्सा
इशान ने अपने करियर के अनुभवों का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने करीब आठ साल के करियर में लगभग 50 प्रतिशत महिला फिल्ममेकर्स के साथ काम किया है। अलग-अलग लोगों के साथ काम करने से दूसरे नजरियों को समझने का अवसर मिलता है।
रिश्तों में भी एक-दूसरे के नजरिए को समझना बेहद जरूरी है। उदाहरण के लिए, अगर आपकी पार्टनर किसी बात को लेकर परेशान है, तो उसकी समस्या को छोटी बात समझकर टाल देना रिश्ते में दूरी बढ़ा सकता है। हो सकता है कि वही बात आपके लिए मामूली हो, लेकिन उसके लिए काफी मायने रखती हो।
ऐसी स्थिति में सामने वाले को गलत साबित करने के बजाय उसकी बात ध्यान से सुनना ज्यादा जरूरी है। हर परेशानी का तुरंत समाधान देना भी जरूरी नहीं होता। कई बार सामने वाले को सिर्फ यह महसूस कराना काफी होता है कि उसकी बात सुनी जा रही है और उसकी भावनाओं की कद्र की जा रही है।
हर समय मजबूत दिखने का दबाव पुरुषों पर क्यों?
समाज में अक्सर पुरुषों से उम्मीद की जाती है कि वे हर परिस्थिति में मजबूत बने रहें। इसी दबाव के कारण कई पुरुष अपने दुख, डर और परेशानियों को खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि अपनी भावनाएं जाहिर करने से लोग उन्हें कमजोर समझेंगे।
लेकिन किसी रिश्ते में चुप रहना हमेशा मजबूती की निशानी नहीं होता। कई बार मन की बात लगातार दबाने से छोटी-छोटी परेशानियां बड़ी गलतफहमियों में बदल जाती हैं।
अगर किसी बात से दुख पहुंचा है, तो पार्टनर के साथ उस पर खुलकर बात करना बेहतर हो सकता है। इसी तरह, मुश्किल समय में मदद मांगना भी गलत नहीं है। जब दोनों लोग बिना किसी डर के अपनी भावनाएं साझा कर पाते हैं, तो उनके बीच भरोसा बढ़ता है और रिश्ते में एक-दूसरे को समझने की गुंजाइश बनती है।
अच्छे रिश्ते की नींव है एक-दूसरे को समझना
इशान खट्टर के मुताबिक, सिनेमा की एक बड़ी ताकत लोगों को दुनिया के अलग-अलग नजरियों से परिचित कराना है। दूसरों के अनुभवों और भावनाओं को समझना न सिर्फ कला, बल्कि व्यक्तिगत रिश्तों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
हर व्यक्ति की परवरिश, सोच और भावनात्मक जरूरतें अलग होती हैं। इसलिए किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए सिर्फ प्यार जताना ही काफी नहीं है। अपने पार्टनर की बात सुनना, उसकी भावनाओं का सम्मान करना और जरूरत पड़ने पर अपनी गलतियों को स्वीकार करना भी उतना ही जरूरी है।
लड़कों को भी अपनी भावनाएं जाहिर करने और जरूरत पड़ने पर रोने की आजादी मिलनी चाहिए। आखिरकार, मर्दानगी का मतलब अपनी भावनाओं को छिपाना या दूसरों से खुद की तुलना करना नहीं है। असली मजबूती खुद को समझने, अपनी भावनाओं को स्वीकार करने और दूसरों के साथ सम्मान से पेश आने में भी है।