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न रंग उड़ता है, न धागा घिसता है! जानिए भारत की उस जादुई साड़ी के बारे में जो 3 पीढ़ियों तक रहती है बिल्कुल नई

 

भारतीय संस्कृति में साड़ी का हमेशा से खास महत्व रहा है। देश के अलग-अलग राज्यों में अपनी खास पहचान रखने वाली कई पारंपरिक साड़ियां हैं, जिनकी खूबसूरती और बुनाई दुनियाभर में मशहूर है। इन्हीं में गुजरात के पाटन की पटोला साड़ी भी शामिल है।आमतौर पर अच्छी क्वालिटी की साड़ियां कुछ हजार रुपये में मिल जाती हैं, लेकिन असली पाटन पटोला की कीमत लाखों रुपये तक पहुंच सकती है। कुछ खास और बेहद जटिल डिजाइन वाली पटोला साड़ियां इससे भी महंगी हो सकती हैं।अब सवाल उठता है कि आखिर एक साड़ी में ऐसा क्या खास है, जिसकी कीमत लाखों रुपये हो सकती है? इसकी वजह सिर्फ खूबसूरत डिजाइन नहीं, बल्कि इसे बनाने की बेहद जटिल और समय लेने वाली पारंपरिक प्रक्रिया है।

डबल इकत तकनीक बनाती है इसे खास

पाटन पटोला की सबसे बड़ी खासियत इसकी डबल इकत बुनाई तकनीक है। आम साड़ियों में अक्सर कपड़ा बुनने के बाद उस पर डिजाइन या रंग दिया जाता है, लेकिन पटोला को तैयार करने का तरीका काफी अलग है।

इसमें ताना और बाना, यानी लंबाई और चौड़ाई दोनों दिशाओं के धागों को बुनाई से पहले ही तय पैटर्न के हिसाब से रंगा जाता है। इसके बाद इन धागों को बेहद सटीक तरीके से करघे पर बुना जाता है।

बुनकर को पहले से यह गणना करनी होती है कि कौन सा रंग और धागा बुनाई के दौरान किस जगह आएगा। जरा सी गलती होने पर पूरा पैटर्न बिगड़ सकता है। यही वजह है कि पटोला बुनने के लिए लंबे अनुभव और बेहद धैर्य की जरूरत होती है।

दोनों तरफ से एक जैसी दिखती है पटोला

पटोला साड़ी की एक और खासियत यह है कि इसे दोनों तरफ से देखा जाए तो डिजाइन लगभग एक जैसा दिखाई देता है। आम साड़ियों में आगे और पीछे की तरफ का अंतर आसानी से पहचाना जा सकता है, लेकिन असली पटोला में यह पहचानना मुश्किल होता है।

इसके रंग, पैटर्न और डिजाइन दोनों तरफ से लगभग समान नजर आते हैं। डबल इकत तकनीक की वजह से तैयार होने वाला यह पैटर्न पटोला को दूसरी पारंपरिक साड़ियों से अलग पहचान देता है।

एक साड़ी तैयार करने में लग सकते हैं कई महीने

पटोला को हाथ से तैयार करने की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। धागों को रंगने से लेकर उनकी बारीकी से सेटिंग और फिर करघे पर बुनाई तक हर चरण में काफी समय और मेहनत लगती है।

डिजाइन की जटिलता के आधार पर एक साड़ी को तैयार होने में कई महीने लग सकते हैं। कुछ बेहद जटिल डिजाइन वाली साड़ियों को तैयार करने में इससे भी ज्यादा समय लग सकता है।

यही वजह है कि असली पाटन पटोला सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि बुनकर की महीनों की मेहनत और पारंपरिक कारीगरी का नतीजा माना जाता है।

प्राकृतिक रंगों और पारंपरिक कारीगरी की खासियत

पारंपरिक पटोला निर्माण में प्राकृतिक रंगों के इस्तेमाल की भी खास पहचान रही है। रंगों को धागों में इस तरह तैयार किया जाता है कि बुनाई के बाद पूरा पैटर्न स्पष्ट और आकर्षक दिखाई दे।

पटोला की कीमत तय करने में इस्तेमाल होने वाला रेशम, डिजाइन की जटिलता, रंगों की संख्या, बुनाई का समय और बुनकर की मेहनत जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं।

पीढ़ियों तक संभालकर रखी जाती है पटोला

पटोला साड़ियों को उनकी टिकाऊ बुनाई और पारंपरिक निर्माण के लिए भी जाना जाता है। अच्छी तरह तैयार और संभालकर रखी गई पटोला साड़ी लंबे समय तक इस्तेमाल की जा सकती है।

इसी वजह से कई परिवारों में ऐसी पारंपरिक साड़ियों को सिर्फ कपड़े की तरह नहीं, बल्कि विरासत के तौर पर संभालकर रखा जाता है और अगली पीढ़ी को भी सौंपा जाता है।

लाखों की कीमत सिर्फ डिजाइन की वजह से नहीं

पाटन पटोला की ऊंची कीमत को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि इसमें सिर्फ महंगा कपड़ा या आकर्षक डिजाइन ही शामिल नहीं होता। इसके पीछे पारंपरिक तकनीक, हाथ से होने वाली बुनाई, अनुभवी कारीगरों की मेहनत और इसे तैयार करने में लगने वाला लंबा समय शामिल होता है।

यही कारण है कि असली पाटन पटोला को भारत की प्रसिद्ध पारंपरिक हस्तकलाओं में गिना जाता है। इसकी कीमत जितनी ज्यादा होती है, उतनी ही ज्यादा इसमें छिपी कारीगरी और मेहनत भी इसे खास बनाती है।