दिल्ली में बढ़ रहे स्वाइन फ्लू के मामले, डॉक्टरों ने दी चेतावनी, सतर्क रहने की सलाह
नई दिल्ली, 14 अगस्त (आईएएनएस)। बदलते मौसम और मानसून के बीच दिल्ली में स्वाइन फ्लू के मामलों को लेकर डॉक्टरों ने लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मौसम में बदलाव, अपेक्षाकृत ठंडा वातावरण, भीड़भाड़ और संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संक्रमण का फैलाव फ्लू के प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता है। हालांकि, सामान्य सर्दी-जुकाम और फ्लू के शुरुआती लक्षण काफी हद तक एक जैसे हो सकते हैं। लेकिन, तेज बुखार, ठंड लगना, शरीर में ज्यादा दर्द और सांस संबंधी परेशानी जैसे लक्षणों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
डॉ. सत्यजीत कुमार और एम्स में मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. नीरज निश्चल ने स्वाइन फ्लू के लक्षण, जोखिम वाले समूह, सामान्य फ्लू से अंतर, बचाव और डॉक्टर से संपर्क करने के संकेतों के बारे में जानकारी दी।
डॉ. सत्यजीत कुमार के मुताबिक स्वाइन फ्लू और दूसरी श्वसन संबंधी बीमारियों के बढ़ने में पर्यावरणीय परिस्थितियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तापमान में बदलाव, भीड़भाड़ और मौसम की परिस्थितियां संक्रमण के फैलाव के लिए अनुकूल वातावरण बनाती हैं। इस मौसम में सामान्य सर्दी-जुकाम और फ्लू के मरीज भी अस्पतालों में ज्यादा दिखाई देते हैं। इसके अलावा, इस दौरान जांच यानी टेस्टिंग भी अधिक होती है, जिसके कारण संक्रमण के मामलों की पहचान ज्यादा संख्या में हो सकती है।
उन्होंने बताया कि स्वाइन फ्लू के मरीजों में कई तरह के लक्षण दिखाई देते हैं। इनमें तेज बुखार, ठंड लगना या कंपकंपी, गले में खराश या दर्द, शरीर में दर्द, हाथ-पैरों में दर्द, सिरदर्द, कमजोरी और अस्वस्थ महसूस होना और कुछ मामलों में सांस लेने में परेशानी प्रमुख हैं। स्वाइन फ्लू में बुखार काफी तेज हो सकता है और कुछ मरीजों में तापमान 102 से 104 डिग्री फॉरेनहाइट तक पहुंच सकता है। तेज बुखार के साथ ठंड लगना, सिरदर्द ऐसे लक्षण हैं, जो सामान्य सर्दी-जुकाम की तुलना में अधिक गंभीर स्थिति की ओर संकेत कर सकते हैं।
उन्होंने कहा कि इसमें आम तौर पर बुखार ज्यादा तेज हो सकता है। इसके साथ ठंड लगना, शरीर में अधिक दर्द और तेज सिरदर्द भी हो सकता है। कुछ मरीजों में तापमान 104 डिग्री तक पहुंच सकता है। लक्षणों के आधार पर शुरुआती अंतर का अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर टेस्टिंग के जरिए संक्रमण की पुष्टि की जा सकती है।
डॉ. ने बताया कि एक्सट्रीम ऑफ एज यानी छोटे बच्चों और बुजुर्गों को संक्रमण के दौरान विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। उन्होंने 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को विशेष सतर्क रहने की सलाह दी। डायबिटीज, अस्थमा, टीबी जैसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों को भी ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। धूम्रपान कर चुके और अब छोड़ चुके लेकिन फेफड़ों से जुड़ी बीमारी वाले लोग भी अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
उन्होंने बताया कि हल्के लक्षण होने पर शुरुआती एक-दो दिन घर पर आराम किया जा सकता है। उन्होंने गर्म पानी पीने, ठंड से बचने और गर्म पानी में नमक डालकर गरारे करने जैसे सामान्य उपायों की सलाह दी। उन्होंने कहा कि शुरुआती दिनों में पर्याप्त आराम और अपनी स्थिति पर नजर रखना जरूरी है। हालांकि, किसी भी दवा का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि लोग अपने स्तर पर दवाइयां शुरू न करें, क्योंकि हर दवा के अपने संभावित साइड इफेक्ट होते हैं।
डॉ. सत्यजीत कुमार ने बताया कि अस्पताल में सामान्य सर्दी-जुकाम, गले में खराश और शरीर में दर्द जैसे लक्षणों वाले कई मरीज आ रहे हैं और हर मरीज की स्थिति के अनुसार जांच और उपचार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अस्पताल में रेस्पिरेटरी मेडिसिन की अलग ओपीडी और वार्ड उपलब्ध हैं। जरूरत पड़ने पर वेंटिलेटर जैसी सुविधाएं भी मौजूद हैं और अस्पताल इस तरह के मामलों से निपटने के लिए तैयार है।
वहीं, एम्स के प्रोफेसर डॉ. नीरज निश्चल ने भी बताया कि जब मौसम अपेक्षाकृत ठंडा होने लगता है तो इन्फ्लूएंजा वायरस के फैलने के लिए वातावरण अधिक अनुकूल हो जाता है। इसका संक्रमण मुख्य रूप से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है, इसलिए संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने पर दूसरे व्यक्ति के संक्रमित होने की संभावना बढ़ सकती है। सामान्य सर्दी-जुकाम अपेक्षाकृत हल्की स्थिति होती है, जबकि इन्फ्लूएंजा कुछ मामलों में गंभीर रूप ले सकता है। खासकर जब संक्रमण फेफड़ों को प्रभावित करता है और निमोनिया जैसी स्थिति पैदा होती है, तब मरीज की स्थिति गंभीर हो सकती है।
उन्होंने कहा कि श्वसन तंत्र प्रभावित होने के कारण सर्दी, जुकाम और खांसी जैसे लक्षण आम हैं। कुछ मरीजों में पेट से जुड़े लक्षण जैसे डायरिया भी देखने को मिल सकते हैं। इसलिए यदि बुखार लगातार बना हुआ है, सांस लेने में परेशानी हो रही है या मरीज की हालत सामान्य नहीं लग रही है, तो डॉक्टर से तत्काल संपर्क करना जरूरी है। उन्होंने बच्चों और बुजुर्गों के साथ-साथ को-मॉर्बिडिटी वाले मरीजों को हाई-रिस्क ग्रुप में रखा। इनमें अस्थमा, हृदय रोग, किडनी की बीमारी और ऐसी स्थितियां शामिल हैं जिनमें मरीज को इम्यूनो-सप्रेशन थेरेपी दी जा रही हो। कैंसर के मरीज भी संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। गर्भवती महिलाएं भी फ्लू के संक्रमण में विशेष सावधानी बरतें और लक्षण होने पर चिकित्सकीय सलाह लें।
डॉ. निश्चल ने कहा कि यदि मरीज को लगे कि उसकी स्थिति ठीक नहीं है या कोई चेतावनी संकेत दिखाई दे रहा है, तो डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिए। संक्रमण से बचाव के लिए कोविड महामारी के दौरान सीखी गई स्वच्छता संबंधी आदतों को अपनाने की सलाह देते हुए, उन्होंने कहा कि हाथों की साफ-सफाई बेहद महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति में फ्लू जैसे लक्षण हैं, तो उसे मास्क का इस्तेमाल करना चाहिए और खांसते या छींकते समय मुंह ढकना चाहिए। खांसने के बाद हाथों को अच्छी तरह धोना भी जरूरी है।
--आईएएनएस
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