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माँ बनने के बाद रोना और चिड़चिड़ापन सामान्य नहीं: जानिए क्या है Postpartum Depression और इसके शुरुआती लक्षण

 

बच्चे के जन्म के बाद मां की जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। नवजात की देखभाल, रातभर जागना, नींद की कमी और शरीर को दोबारा स्वस्थ होने में लगने वाला समय नई मां के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। इस दौरान थकान और भावनात्मक उतार-चढ़ाव महसूस होना सामान्य है, लेकिन अगर महिला लगातार उदास रहने लगे, बार-बार रोए, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगे या बच्चे के साथ जुड़ाव महसूस न कर पाए, तो इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

ये लक्षण पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression) से जुड़े हो सकते हैं। यह बच्चे के जन्म के बाद होने वाली मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, जो मां की भावनात्मक स्थिति, रोजमर्रा के कामकाज और बच्चे की देखभाल करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। अपोलो क्लिनिक की डॉ. ए.एस. स्मिता बी. कलप्पा के अनुसार, ऐसे लक्षणों को केवल थकान मानकर टालना सही नहीं है।

क्या होता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक ऐसी मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है, जो बच्चे के जन्म के बाद विकसित हो सकती है। इसे सामान्य बेबी ब्लूज़ से अलग समझना जरूरी है।बेबी ब्लूज़ में मां को कुछ दिनों तक भावनात्मक उतार-चढ़ाव, बेचैनी या रोने की इच्छा महसूस हो सकती है। आमतौर पर ये लक्षण करीब दो सप्ताह के भीतर कम होने लगते हैं। इसके विपरीत, पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण अधिक गंभीर हो सकते हैं और कई सप्ताह या महीनों तक बने रह सकते हैं।इस स्थिति में महिला को लगातार उदासी, निराशा, अपराधबोध या अकेलेपन का अनुभव हो सकता है। कई बार बच्चे की देखभाल करना भी मुश्किल लगने लगता है। यह मां की कमजोरी नहीं, बल्कि एक ऐसी स्वास्थ्य समस्या है, जिसमें सही समय पर मदद लेना जरूरी है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के 9 लक्षण जिन्हें नहीं करना चाहिए नजरअंदाज

बच्चे के जन्म के बाद अगर महिला में नीचे दिए गए लक्षण लगातार दिखाई दें, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है।

1. बार-बार रोना: बिना किसी स्पष्ट वजह के रोने का मन करना या छोटी-छोटी बातों पर भावुक हो जाना।

2. लगातार उदासी महसूस होना: कई दिनों तक मन भारी रहना, खालीपन महसूस करना या किसी काम में खुशी न मिलना।

3. गुस्सा और चिड़चिड़ापन बढ़ना: छोटी-छोटी बातों पर परेशान होना, गुस्सा आना या बेचैनी महसूस करना।

4. बच्चे से जुड़ाव महसूस न होना: बच्चे की देखभाल में रुचि कम होना या उसके साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाने में कठिनाई होना।

5. नींद में बदलाव: बच्चे के सोने पर भी नींद न आना या जरूरत से ज्यादा सोने का मन करना।

6. लगातार थकान रहना: पर्याप्त आराम के बावजूद ऊर्जा की कमी महसूस होना और रोजमर्रा के काम मुश्किल लगना।

7. खुद को दोषी समझना: खुद को अच्छा मां न मानना, बेकार महसूस करना या जरूरत से ज्यादा अपराधबोध होना।

8. लोगों से दूरी बनाना: परिवार और दोस्तों से बातचीत करने या मिलने-जुलने का मन न करना।

9. ध्यान लगाने में परेशानी: किसी काम पर ध्यान केंद्रित करने या छोटे-छोटे फैसले लेने में कठिनाई होना।

इनमें से कोई एक लक्षण दिखाई देने का मतलब यह नहीं कि महिला को निश्चित रूप से पोस्टपार्टम डिप्रेशन है। हालांकि, लक्षण लगातार बने रहें या गंभीर हों, तो डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।

डिलीवरी के बाद क्यों बढ़ सकता है डिप्रेशन का खतरा?

पोस्टपार्टम डिप्रेशन होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। बच्चे के जन्म के बाद शरीर में हार्मोन का स्तर तेजी से बदलता है। इसके साथ ही प्रसव से उबरने की प्रक्रिया, नींद की कमी और नवजात की लगातार देखभाल मानसिक और शारीरिक तनाव बढ़ा सकती है।

इसके अलावा कुछ परिस्थितियां जोखिम बढ़ा सकती हैं:

  • पहले से डिप्रेशन या किसी अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्या का इतिहास होना।

  • गर्भावस्था या प्रसव के दौरान अधिक तनाव का सामना करना।

  • परिवार या साथी से पर्याप्त सहयोग नहीं मिलना।

  • बच्चे की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों का दबाव बढ़ना।

  • प्रसव के बाद शारीरिक परेशानियों या स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का सामना करना।

यह समस्या किसी भी नई मां को हो सकती है। इसलिए महिला को दोष देने के बजाय उसकी स्थिति को समझना और उसे सहयोग देना जरूरी है।

कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए?

अगर उदासी, चिड़चिड़ापन या अन्य भावनात्मक समस्याएं दो सप्ताह से अधिक समय तक बनी रहती हैं, बढ़ती जा रही हैं या रोजमर्रा के काम और बच्चे की देखभाल पर असर डाल रही हैं, तो डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से संपर्क करें। गंभीर लक्षण होने पर दो सप्ताह तक इंतजार नहीं करना चाहिए।पोस्टपार्टम डिप्रेशन का इलाज संभव है। स्थिति के अनुसार डॉक्टर काउंसलिंग, मनोचिकित्सा या दवाओं की सलाह दे सकते हैं। स्तनपान कराने वाली महिलाओं को दवा लेने से पहले डॉक्टर से उसकी सुरक्षा के बारे में जरूर पूछना चाहिए।अगर महिला को खुद को या बच्चे को नुकसान पहुंचाने के विचार आ रहे हों, तो इसे आपात स्थिति मानें और तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

नई मां को परिवार का सहयोग क्यों है जरूरी?

बच्चे के जन्म के बाद मां की देखभाल भी उतनी ही जरूरी है, जितनी नवजात की। परिवार के सदस्य बच्चे की देखभाल और घरेलू कामों में हाथ बंटाकर महिला को आराम करने का समय दे सकते हैं।नई मां की बातों को ध्यान से सुनना, उसकी भावनाओं को समझना और उसे बिना किसी आलोचना के अपनी परेशानी बताने का मौका देना भी महत्वपूर्ण है। उसे यह महसूस कराना चाहिए कि मदद मांगना कमजोरी नहीं है।