ऑटोइम्यून बीमारियों से जूझ रही महिलाओं को 'ये तो दिमागी समस्या' कहकर टालने के मामले ज्यादा: स्टडी में खुलासा
नई दिल्ली, 13 अक्टूबर (आईएएनएस)। ऑटोइम्यून बीमारियों से जूझ रही महिलाओं को पुरुषों की तुलना में ट्रीटमेंट जल्दी नहीं मिलता है। उन्हें बार-बार यह बताया जाता है कि उनके लक्षणों की वजह मानसिक या मनोवैज्ञानिक है। इससे बीमारी की सही पहचान और उपचार में देरी हो सकती है। ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है।
शोधकर्ताओं ने ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित 6,607 लोगों के अनुभवों का विश्लेषण किया। अध्ययन के निष्कर्ष 13 अक्टूबर को मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट ईक्लिनिकलमेडिसिन’ में प्रकाशित हुए। इसमें शामिल अधिकांश प्रतिभागी महिलाएं और ब्रिटेन के निवासी थे।
अध्ययन में 43 प्रतिशत महिलाओं ने बताया कि उनके लक्षणों को पहले मानसिक या मनोरोग संबंधी कारणों से जोड़ दिया गया था। पुरुषों में ऐसा अनुभव करने वालों का आंकड़ा 33 प्रतिशत था। इसी तरह, 34 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उनके शारीरिक लक्षणों को मनोदैहिक समस्या बताया गया, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 22 प्रतिशत था।
शोधकर्ताओं के अनुसार, मनोदैहिक लक्षणों से आशय उन शारीरिक समस्याओं से है, जिन्हें मनोवैज्ञानिक कारकों से उत्पन्न या प्रभावित माना जाता है। अध्ययन में उम्र, बीमारी के प्रकार, महाद्वीप और घरेलू आर्थिक स्थिति जैसे कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी महिलाओं में इस तरह की गलत पहचान की आशंका पुरुषों से अधिक पाई गई।
विश्लेषण के मुताबिक, महिलाओं में बीमारी को गलत तरीके से मनोरोग संबंधी समस्या बताने की संभावना पुरुषों की तुलना में 46 प्रतिशत अधिक थी। वहीं, लक्षणों को मनोदैहिक समस्या बताने की संभावना 74 प्रतिशत अधिक पाई गई।
अध्ययन में बीमारी की सही पहचान होने में लगने वाले समय को लेकर भी भेद नजर आया। पुरुषों में सबसे आम अनुभव यह था कि लक्षण सामने आने के तीन महीने के भीतर बीमारी की पहचान हो गई। इसके विपरीत, महिलाओं ने अक्सर बताया कि उन्हें सही निदान के लिए एक से दो साल तक इंतजार करना पड़ा। इस दौरान उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अधिक बार डॉक्टरों के पास भी जाना पड़ा।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के जनस्वास्थ्य एवं प्राथमिक देखभाल विभाग की शोधकर्ता और अध्ययन की प्रमुख लेखिका मेलानी स्लोन ने कहा कि इस तरह के गलत निदान का महिलाओं पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है। इससे डॉक्टरों पर उनका भरोसा और खुद के अनुभवों पर उनका विश्वास कमजोर हो सकता है। उन्होंने कहा कि कई महिलाओं को सही बीमारी का पता चलने से पहले वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है, जिससे इलाज में भी देरी होती है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, ऑटोइम्यून बीमारियों की पहचान करना कई बार मुश्किल होता है। इन बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला करने लगती है। इसके कारण थकान, मांसपेशियों में दर्द, त्वचा पर चकत्ते और नींद संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। ये लक्षण कई अन्य स्थितियों में भी दिखाई देते हैं और बीमारी के शुरुआती चरण में उनका सही कारण स्पष्ट नहीं हो पाता।
महिलाओं में लगभग एक चौथाई को ऑटोइम्यून थायरॉयड रोग था। इसमें हाशिमोटो रोग के कारण थायरॉयड ग्रंथि कम सक्रिय हो सकती है, जबकि ग्रेव्स रोग में यह जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाती है। हाशिमोटो रोग के लक्षणों में वजन बढ़ना, बाल झड़ना, थकान और जोड़ों में दर्द शामिल हो सकते हैं। ग्रेव्स रोग में वजन कम होना, दिल की धड़कन तेज होना और आंखों का उभरना जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।
लगभग सात में से एक महिला को सिस्टमिक ल्यूपस था, जो थकान, त्वचा पर चकत्ते और मांसपेशियों में दर्द का कारण बन सकता है। पुरुष प्रतिभागियों में रूमेटॉइड आर्थराइटिस, वैस्कुलाइटिस और एंटीफॉस्फोलिपिड सिंड्रोम जैसी बीमारियां अधिक आम थीं।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि पुरुषों में किसी दूसरी शारीरिक बीमारी का गलत निदान होने की रिपोर्ट महिलाओं से कुछ अधिक थी। पुरुषों में यह आंकड़ा 48 प्रतिशत और महिलाओं में 44 प्रतिशत था। इससे संकेत मिलता है कि ऑटोइम्यून बीमारियों की पहचान में कठिनाइयां दोनों लिंगों को प्रभावित करती हैं, लेकिन मानसिक या मनोवैज्ञानिक कारणों से जोड़ने के मामले में महिलाओं को अतिरिक्त नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही लैंगिक धारणाएं आज भी निदान की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती हैं। महिलाओं के लक्षणों को अधिक भावनात्मक मानना या उनकी शिकायतों को कम विश्वसनीय समझना सही बीमारी की पहचान में बाधा बन सकता है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, मरीजों के अनुभवों को सुनना और उन्हें महत्व देना बेहतर इलाज की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि महिलाओं की शारीरिक शिकायतों को समय रहते गंभीरता से लेना और सही जांच सुनिश्चित करना बीमारी की पहचान में होने वाली देरी को कम करने में मदद कर सकता है।
--आईएएनएस
केआर/