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स्पेस में आंखों और मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों की जांच में जुटा नासा, जानें क्या है 'एसएएनएस'

 

नई दिल्ली, 14 जून (आईएएनएस)। स्पेस में लंबा सफर तय करने वाले एस्ट्रोनॉट्स की सेहत संबंधित समस्याएं जल्दी खत्म नहीं होती हैं। पृथ्वी से लंबे समय तक दूर रहने का असर केवल शरीर की मांसपेशियों और हड्डियों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि आंखों और दिमाग की सेहत भी इससे प्रभावित होती है।

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा इस विषय पर काम कर रही है ताकि भविष्य में चंद्रमा, मंगल और अन्य स्पेस मिशन्स पर जाने वाले एस्ट्रोनॉट्स को बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा मिल सके।

नासा के जॉनसन स्पेस सेंटर ने सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई जानकारी में बताया कि स्पेस में भारहीनता की स्थिति के कारण शरीर के तरल पदार्थों का संतुलन बदल जाता है। पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से शरीर के तरल पदार्थ नीचे की ओर बने रहते हैं, लेकिन स्पेस में ऐसा नहीं होता। इसके कारण खून, रीढ़ से जुड़े द्रव और अन्य तरल पदार्थ सिर की ओर खिसक सकते हैं, जिससे आंखों और मस्तिष्क के आसपास दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहने वाले 70 प्रतिशत एस्ट्रोनॉट्स में आंखों के पिछले हिस्से में सूजन देखी गई है। इस स्थिति को 'स्पेस फ्लाइट एसोसिएटेड न्यूरो-ऑक्युलर सिंड्रोम' (एसएएनएस) कहा जाता है। इसके कारण कुछ एस्ट्रोनॉट्स की दृष्टि पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि, पृथ्वी पर लौटने के बाद अधिकांश मामलों में सूजन कम हो जाती है और दृष्टि में सुधार देखने को मिलता है, लेकिन वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि क्या इन बदलावों का कोई लंबे समय तक प्रभाव भी रहता है। इसी उद्देश्य से नासा एक स्पेशल रिसर्च प्रोग्राम चला रहा है, जिसमें स्पेस जर्नी के बाद पांच सालों तक एस्ट्रोनॉट्स की आंखों और दिमाग की सेहत की निगरानी की जाएगी।

इस अध्ययन में 20 ऐसे एस्ट्रोनॉट्स को शामिल किया जाएगा, जिन्होंने इंटरनेसनल स्पेस स्टेशन पर लंबे समय तक मिशन पूरे किए हैं। इसके साथ ही समान आयु और शारीरिक बनावट वाले 20 अन्य मेंबर्स को भी अध्ययन का हिस्सा बनाया जाएगा, ताकि सामान्य उम्र बढ़ने और अंतरिक्ष यात्रा से होने वाले प्रभावों के बीच अंतर को समझा जा सके।

शोध के दौरान प्रतिभागियों की आंखों की गहराई से जांच की जाएगी। इसमें दृष्टि क्षमता, देखने के दायरे और आंखों के अंदर के दबाव का परीक्षण शामिल होगा। वहीं, मस्तिष्क की स्थिति जानने के लिए एमआरआई स्कैन, न्यूरोलॉजिकल परीक्षण, संज्ञानात्मक मूल्यांकन और ब्लड टेस्ट भी किया जाएगा।

नासा का मानना है कि इस अध्ययन से प्राप्त जानकारी भविष्य के लंबे स्पेस मिशन्स को अधिक सुरक्षित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि अंतरिक्ष यात्रियों के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए किन अतिरिक्त उपायों की आवश्यकता है।

--आईएएनएस

एमटी/पीएम