पृथ्वी से ज्यादा गड्ढों से भरा है चंद्रमा, जानें क्यों नहीं मिटते क्रेटर्स के निशान
नई दिल्ली, 30 मई (आईएएनएस)। 31 मई को आसमान में पूर्णिमा यानी फुल मून का सुंदर नजारा देखने को मिलेगा। चंद्रमा हमेशा से लोगों के लिए आकर्षण और जिज्ञासा का विषय रहा है। इसकी चमक, आकार में बदलाव और सतह पर दिखाई देने वाले गड्ढे (क्रेटर्स) अक्सर लोगों के मन में कई सवाल पैदा करते हैं। इन्हीं सवालों में से एक सबसे आम सवाल यह है कि चंद्रमा पर इतने अधिक गड्ढे क्यों दिखाई देते हैं, जबकि पृथ्वी पर ऐसे गड्ढे बहुत कम नजर आते हैं?
चंद्रमा को निहारेंगे तो उसकी सतह पर बने हजारों गड्ढे आसानी से दिखाई देंगे। चंद्रमा पर ये गड्ढे (क्रेटर्स) देखकर अक्सर सवाल उठता है कि आखिर ये इतने सारे गड्ढे चंद्रमा पर क्यों हैं, जबकि पृथ्वी पर 180 के करीब ही ज्ञात गड्ढे हैं? ऐसे में वैज्ञानिक बताते हैं कि चंद्रमा पर गड्ढों की भरमार का सबसे बड़ा कारण है कि वहां कोई वातावरण नहीं है। पृथ्वी और चंद्रमा दोनों ही पिछले 4.5 अरब सालों से अंतरिक्ष में उल्कापिंडों और क्षुद्रग्रहों के हमलों का शिकार रहे हैं। लेकिन पृथ्वी इन निशानों को मिटा देती है, जबकि चंद्रमा उन्हें सदियों तक संजोए रखता है।
पृथ्वी गड्ढों को क्यों मिटा देती है? पृथ्वी पर तीन प्रमुख प्रक्रियाएं गड्ढों को लगभग पूरी तरह नष्ट कर देती हैं। पहली प्रक्रिया - अपरदन, इसमें पृथ्वी पर हवा, बारिश, नदियां, समुद्र और पेड़-पौधे निरंतर काम करते रहते हैं। ये सब मिलकर चट्टानों को तोड़ते-घिसते रहते हैं। समय के साथ कोई भी गड्ढा धीरे-धीरे भर जाता है या पूरी तरह मिट जाता है। वहीं, चंद्रमा पर वायुमंडल नहीं है, इसलिए न हवा है, न पानी है और न मौसम। एक बार कोई उल्कापिंड टकरा जाए तो उसका निशान लाखों-करोड़ों साल तक वैसा ही बना रहता है। यही वजह है कि चंद्रमा पर एस्ट्रोनॉट्स के पैरों के निशान आज भी बरकरार हैं।
दूसरी प्रक्रिया प्लेट टेक्टोनिक्स है, जिसमें पृथ्वी की सतह लगातार हिलती-डुलती और नई चट्टानें बनती हैं, पुरानी चट्टानें अंदर धंस जाती हैं। इस वजह से पुराने गड्ढे दब जाते हैं या नष्ट हो जाते हैं। चंद्रमा पर ऐसी कोई गतिविधि नहीं है। वहां अरबों साल से सतह स्थिर है, इसलिए गड्ढे जस के तस बने हुए हैं।
तीसरी प्रक्रिया ज्वालामुखी गतिविधि है। पृथ्वी पर ज्वालामुखी लावा निकालकर कई गड्ढों को ढक देते हैं। चंद्रमा पर भी बहुत पहले ज्वालामुखी सक्रिय थे, जिन्होंने कुछ बड़े गड्ढों को ढका था, लेकिन पिछले तीन अरब वर्षों से वहां कोई ज्वालामुखी गतिविधि नहीं हुई है।
--आईएएनएस
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