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अमेरिका का आरोप: चीन ने 2020 में छिपकर किया परमाणु परीक्षण, वैश्विक सुरक्षा में बढ़ा तनाव

 

अमेरिका और चीन के बीच परमाणु हथियारों को लेकर तनाव फिर से बढ़ गया है। अमेरिकी अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि चीन ने छह साल पहले, यानी 22 जून 2020 को, एक गुप्त लोफ नूर अंडरग्राउंड न्यूक्लियर टेस्ट सेंटर में परमाणु परीक्षण किया था। इस खुलासे के बाद वैश्विक सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता पर नई चिंताओं का जन्म हुआ है।

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अमेरिकी विदेश विभाग के सहायक सचिव क्रिस्टोफर येव ने सोमवार को जानकारी देते हुए कहा कि यह विस्फोट पड़ोसी देश कजाकिस्तान के भूकंपीय स्टेशन से दर्ज किया गया। परीक्षण का विस्फोट 2.75 तीव्रता का था और इसे आम माइनिंग या भूंकप विस्फोट से अलग बताया गया। येव ने कहा कि यह एक सिंगल फायर एक्सप्लोजन था, जो स्पष्ट रूप से परमाणु परीक्षण की निशानी है।

क्रिस्टोफर येव ने बताया कि चीन ने यह कदम जानबूझकर अपनी परमाणु ताकत बढ़ाने के लिए उठाया। उनके अनुसार, 2020 से अब तक चीन के परमाणु हथियारों की संख्या लगभग 200 से बढ़कर 600 से ज्यादा हो गई है। वैश्विक सुरक्षा विश्लेषकों का अनुमान है कि 2030 तक चीन के पास 1,000 से अधिक परमाणु हथियार हो सकते हैं।

अमेरिकी अधिकारियों ने इस कदम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा समझौतों और वैश्विक स्थिरता के लिए चुनौतीपूर्ण बताया। येव ने कहा, "इस तरह के छिपे हुए परमाणु परीक्षण न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक सुरक्षा को भी खतरे में डालते हैं।" उन्होंने चीन से जिम्मेदारीपूर्वक और पारदर्शी रूप से अपने परमाणु कार्यक्रम की जानकारी साझा करने की मांग की।

विशेषज्ञों के अनुसार, चीन का यह परीक्षण न केवल अमेरिका बल्कि एशियाई पड़ोसी देशों के लिए भी चिंता का विषय है। इससे यह संकेत मिलता है कि चीन अपनी सैन्य और परमाणु क्षमताओं को तेजी से बढ़ा रहा है, जो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि चीन की ओर से अभी तक इस आरोप पर कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है। चीन पिछले कई वर्षों से अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम पर चुप्पी बनाए हुए है और इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मानता है।

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाएंगे। साथ ही, यह कदम अमेरिका और चीन के बीच परमाणु हथियारों की दौड़ को और तेज कर सकता है। इस घटना ने दुनिया में परमाणु हथियारों के नियंत्रण और वैश्विक सुरक्षा के मुद्दों पर बहस को नया मोड़ दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में नीतिगत और कूटनीतिक संघर्ष बढ़ सकते हैं। इस तरह के घटनाक्रम न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर सुरक्षा और स्थिरता को चुनौती देते हैं। अमेरिका की चेतावनी और चीन की मौन नीति के बीच अब अंतरराष्ट्रीय निगाहें इस मामले पर टिकी हुई हैं।