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Vinod Khanna Birthday: विलेन से सुपरस्टार बने विनोद खन्ना, फिर ओशो के आश्रम पहुंचे; ऐसी रही जिंदगी
 

 

हिंदी सिनेमा के इतिहास में 70 का दशक कई बड़े सितारों के नाम रहा। राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर जैसे कलाकारों के बीच विनोद खन्ना ने भी अपनी अलग पहचान बनाई। शानदार अभिनय, दमदार स्क्रीन प्रेजेंस और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण वह जल्द ही दर्शकों के पसंदीदा सितारों में शामिल हो गए।
6 अक्टूबर को विनोद खन्ना की बर्थ एनिवर्सरी है। अगर वह आज हमारे बीच होते तो अपना 80वां जन्मदिन मना रहे होते। उनके फिल्मी सफर के साथ उनकी निजी जिंदगी भी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही।
‘मन का मीत’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर
विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। फिल्मों में उनकी एंट्री 1969 में आई फिल्म ‘मन का मीत’ से हुई। इस फिल्म में उन्हें अभिनेता सुनील दत्त ने मौका दिया था।
शुरुआत में विनोद खन्ना को सपोर्टिंग रोल मिले और बाद में उन्होंने फिल्मों में विलेन के किरदार भी निभाए। हालांकि उनके लुक्स और अभिनय की चर्चा लगातार बढ़ती गई।
पिता फिल्मों में जाने के खिलाफ थे
विनोद खन्ना के फिल्मों में आने का फैसला उनके परिवार को आसानी से मंजूर नहीं था। बताया जाता है कि जब उनके पिता को उनके एक्टिंग करियर की इच्छा के बारे में पता चला तो वह काफी नाराज हुए थे।
कहा जाता है कि गुस्से में उनके पिता ने विनोद खन्ना पर पिस्तौल तक तान दी थी और फिल्मों में जाने पर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी। बाद में उनकी मां ने हस्तक्षेप किया और उन्हें सीमित समय के लिए फिल्मों में किस्मत आजमाने का मौका मिला।
शर्त यह थी कि अगर वह सफल नहीं हुए तो उन्हें पारिवारिक कारोबार में वापस आना होगा।
विलेन से बने बॉलीवुड के बड़े हीरो
विनोद खन्ना ने शुरुआती दौर में कई फिल्मों में नकारात्मक किरदार निभाए। ‘सच्चा झूठा’, ‘आन मिलो सजना’ और ‘मेरा गांव मेरा देश’ जैसी फिल्मों में उनके विलेन के किरदारों को पसंद किया गया।
इसके बाद उन्होंने बतौर लीड एक्टर अपनी पहचान बनाई। ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘कुर्बानी’, ‘इम्तिहान’, ‘दयावान’, ‘इंसाफ’, ‘अचानक’ और ‘सत्यमेव जयते’ जैसी फिल्मों ने उन्हें बड़े स्टार के रूप में स्थापित किया।
जब सुपरस्टारडम छोड़ ओशो की शरण में पहुंचे
विनोद खन्ना की जिंदगी का सबसे चर्चित दौर वह रहा, जब उन्होंने अपने सफल फिल्मी करियर से दूरी बना ली। वह आध्यात्मिक गुरु ओशो रजनीश से प्रभावित हुए और अमेरिका के ओरेगन स्थित रजनीशपुरम आश्रम चले गए।
बताया जाता है कि उन्होंने वहां कई वर्षों तक समय बिताया। आश्रम में वह सामान्य जीवन जीते हुए बागवानी, सफाई और दूसरे काम भी करते थे। एक समय बड़े पर्दे पर स्टार की जिंदगी जीने वाले विनोद खन्ना का यह रूप उनके प्रशंसकों के लिए काफी अलग था।
आश्रम से लौटकर फिर फिल्मों में की वापसी
कई वर्षों तक फिल्म इंडस्ट्री से दूर रहने के बाद विनोद खन्ना ने दोबारा बॉलीवुड का रुख किया। उनकी वापसी के बाद उन्होंने फिर फिल्मों में काम करना शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी जगह दोबारा बनाई।
दो शादियां और चार बच्चे
विनोद खन्ना ने 1971 में गीतांजलि खन्ना से शादी की थी। दोनों के दो बेटे अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना हुए। बाद में विनोद खन्ना के ओशो आश्रम जाने के दौरान उनके वैवाहिक जीवन में भी मुश्किलें आईं और 1985 में दोनों का तलाक हो गया।
इसके बाद 1990 में उन्होंने कविता खन्ना से दूसरी शादी की। दोनों के एक बेटा साक्षी और बेटी श्रद्धा हैं।
अभिनय के लिए मिले बड़े सम्मान
विनोद खन्ना को उनके अभिनय के लिए कई बड़े पुरस्कार मिले। 1975 में फिल्म ‘हाथ की सफाई’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर अवॉर्ड मिला।
1999 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उनके निधन के बाद 2018 में उन्हें देश के सबसे प्रतिष्ठित फिल्म सम्मानों में से एक दादा साहेब फाल्के पुरस्कार मरणोपरांत प्रदान किया गया।
71 साल की उम्र में हुआ निधन
विनोद खन्ना का 27 अप्रैल 2017 को मुंबई में निधन हो गया। वह कैंसर से जूझ रहे थे और उनका इलाज सर एचएन रिलायंस फाउंडेशन हॉस्पिटल में चल रहा था।
71 साल की उम्र में उनके निधन के साथ हिंदी सिनेमा ने एक ऐसा अभिनेता खो दिया, जिसने अपने करियर में विलेन से लेकर हीरो और सुपरस्टार तक का सफर तय किया। उनकी फिल्में और उनकी खास स्क्रीन प्रेजेंस आज भी उन्हें बॉलीवुड के यादगार सितारों में शामिल करती हैं।