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राजनीति के पर्दे के पीछे का खेल दिखाती हैं ये 5 फिल्में और सीरीज, सत्ता की चालें देखकर रह जाएंगे हैरान

 

OTT Political Movies and Series: राजनीति की दुनिया सिर्फ चुनाव, भाषण और सत्ता हासिल करने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे रणनीति, मीडिया की ताकत, आपसी खींचतान और ऐसे फैसलों की कहानी भी छिपी होती है, जो देश की दिशा बदल सकते हैं। कहीं नेताओं की छवि बनाने की कोशिश होती है, तो कहीं सत्ता की कुर्सी के लिए करीबी लोग ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।

अगर आपको राजनीति, सत्ता के संघर्ष और पर्दे के पीछे होने वाली चालों पर आधारित फिल्में और सीरीज पसंद हैं, तो ये पांच टाइटल आपकी वॉचलिस्ट में शामिल हो सकते हैं। इनमें राजनीतिक रणनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक के कई दिलचस्प पहलू देखने को मिलते हैं।

1. द विजार्ड ऑफ द क्रेमलिन — ZEE5

राजनीति में किसी नेता की छवि बनाने के लिए मीडिया और कहानियों का किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है, यह फिल्म इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है। ओलिवियर असायस के निर्देशन में बनी इस फिल्म में पॉल डैनो ने वादिम बारानोव का किरदार निभाया है, जो टेलीविजन की दुनिया से निकलकर रूस की सत्ता के गलियारों में एक प्रभावशाली रणनीतिकार बन जाता है।

जूड लॉ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भूमिका में नजर आते हैं। जैसे-जैसे सत्ता का प्रभाव बढ़ता है, बारानोव की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती जाती है। फिल्म दिखाती है कि राजनीति में सिर्फ फैसले लेना ही जरूरी नहीं होता, बल्कि जनता उन फैसलों और नेताओं को किस नजर से देखती है, यह भी मायने रखता है।

2. द आइड्स ऑफ मार्च — ZEE5

चुनाव जीतने की चाह इंसान को किस हद तक बदल सकती है? द आइड्स ऑफ मार्च इसी सवाल को दिलचस्प अंदाज में पेश करती है। फिल्म में रयान गॉसलिंग ने स्टीफन मेयर्स का किरदार निभाया है, जो राष्ट्रपति पद की दौड़ में शामिल गवर्नर माइक मॉरिस के चुनावी अभियान से जुड़ा होता है। जॉर्ज क्लूनी ने मॉरिस की भूमिका निभाई है।

जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता है, राजनीतिक रणनीतियां, विवाद और पर्दे के पीछे चलने वाली चालें कहानी को नया मोड़ देती हैं। स्टीफन के सामने ऐसी परिस्थितियां आती हैं, जो उसके भरोसे और आदर्शों को चुनौती देती हैं। यह फिल्म दिखाती है कि सत्ता की दौड़ में नैतिकता और निजी महत्वाकांक्षा के बीच की दूरी कितनी कम हो सकती है।

3. द डेथ ऑफ स्टालिन — YouTube

सत्ता में बैठे किसी ताकतवर नेता की मौत के बाद उसके आसपास के लोगों के बीच क्या-क्या हो सकता है? द डेथ ऑफ स्टालिन इस सवाल का जवाब व्यंग्य और डार्क कॉमेडी के जरिए देती है।

1953 में सोवियत नेता जोसेफ स्टालिन की मौत के बाद उनके सहयोगियों के बीच सत्ता और प्रभाव हासिल करने की होड़ शुरू हो जाती है। हर कोई अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है और बदलते हालात में वफादारियां भी बदलने लगती हैं।

आर्मांडो इयानुची के निर्देशन में बनी इस फिल्म में स्टीव बुसेमी ने निकिता ख्रुश्चेव और साइमन रसेल बील ने लाव्रेंती बेरिया का किरदार निभाया है। गंभीर ऐतिहासिक घटनाओं को हास्य के जरिए दिखाने वाली यह फिल्म सत्ता की भूख और राजनीतिक जोड़-तोड़ पर तीखा व्यंग्य करती है।

4. द डिप्लोमैट — Netflix

राजनीति सिर्फ देश के भीतर सत्ता हासिल करने का खेल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को संभालने की चुनौती भी है। Netflix की सीरीज द डिप्लोमैट इसी दुनिया की झलक दिखाती है।

केरी रसेल ने केट वायलर का किरदार निभाया है, जो अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच ब्रिटेन में अमेरिका की राजदूत बनती हैं। नई जिम्मेदारियों के साथ उन्हें सरकारों के बीच तनाव संभालना होता है। वहीं, उनकी निजी जिंदगी और पति हैल वायलर के साथ रिश्ते की उलझनें भी कहानी का हिस्सा हैं। रूफस सीवेल ने हैल की भूमिका निभाई है।

सीरीज दिखाती है कि कूटनीति में हर शब्द, हर बातचीत और हर फैसला कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। साथ ही यह भी सामने आता है कि बड़े राजनीतिक फैसलों का दबाव उन्हें लेने वाले लोगों की निजी जिंदगी को किस तरह प्रभावित करता है।

5. द ब्रिंक ऑफ वॉर — अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की कहानी

शीत युद्ध के दौर में दो महाशक्तियों के बीच बातचीत और परमाणु हथियारों को लेकर तनाव की कहानी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा रही है। रेक्याविक समिट, जो 1986 में अमेरिका और सोवियत संघ के नेताओं के बीच हुई थी, इसी इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।

इस विषय पर आधारित कहानी में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचेव के बीच परमाणु हथियारों में कटौती को लेकर बातचीत को केंद्र में रखा गया है। ऐसी वार्ताओं में हर प्रस्ताव और हर फैसला दोनों देशों के रिश्तों के साथ वैश्विक सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता था।

यह विषय दिखाता है कि जब पूरी दुनिया की सुरक्षा दांव पर हो, तो बातचीत में समझौता करना, अपने देश के हितों की रक्षा करना और तनाव को बढ़ने से रोकना कितना मुश्किल हो सकता है।