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ध्रुपद धमार की परंपरा खत्म हो चुकी... जब जिया फरीदुद्दीन डागर ने जताई थी चिंता

 

नई दिल्ली, 14 जून (आईएएनएस)। भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे प्राचीन गायन शैलियों में शामिल ध्रुपद को आज जिस सम्मान और पहचान के साथ देखा जाता है, उसके पीछे कुछ महान कलाकारों की आजीवन साधना छिपी हुई है। इनमें उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर का नाम सबसे प्रमुखता से लिया जाता है।

एक इंटरव्यू में उन्होंने ध्रुपद की स्थिति को लेकर अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा था कि ध्रुपद-धमार की गायकी कई दशक पहले लगभग समाप्त हो चुकी थी और यह परंपरा केवल कुछ परिवारों और चुनिंदा कलाकारों के प्रयासों से बची पाई।

उस्ताद का मानना था कि समय के साथ संगीत की कई परंपराएं बदल गईं। उन्होंने बताया था कि ध्रुपद का मूल स्वरूप धीरे-धीरे कम होता गया और कई कलाकारों का ध्यान सुरों की गहराई से हटकर ताल की जटिलताओं पर केंद्रित हो गया। ध्रुपद का एक पक्ष नृत्य से भी जुड़ा रहा, जहां इसके पदों पर प्रस्तुति दी जाती थी, लेकिन शास्त्रीय गायन के रूप में इसकी मूल पहचान लगातार कमजोर होती चली गई।

उन्होंने ध्रुपद की विभिन्न परंपराओं का भी उल्लेख किया था। उनके अनुसार ध्रुपद में कई वाणियां मानी जाती हैं, जिनमें शुद्धा, भिन्ना, गौड़ी, व्यंगसुरा और साधारणी प्रमुख हैं। डागर परिवार जिस शैली को आगे बढ़ाता रहा, उसे साधारणी वाणी या डागर वाणी के नाम से जाना जाता है। यही शैली आगे चलकर उनकी पहचान बनी।

15 जून 1932 को राजस्थान के उदयपुर में जन्मे जिया फरीदुद्दीन डागर ऐसे परिवार में पैदा हुए, जहां संगीत जीवन का अभिन्न हिस्सा था। उनके पिता उस्ताद जियाउद्दीन डागर प्रतिष्ठित संगीतज्ञ थे और उन्होंने बचपन से ही अपने पुत्र को ध्रुपद गायन की शिक्षा देना शुरू कर दिया था। कम उम्र में ही जिया फरीदुद्दीन ने सुर और राग की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया था।

पिता के निधन के बाद उनके बड़े भाई उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर ने उनकी संगीत शिक्षा की जिम्मेदारी संभाली। जिया मोहिउद्दीन डागर रुद्र वीणा के प्रसिद्ध वादक थे। दोनों भाइयों ने मिलकर ध्रुपद को नए सिरे से स्थापित करने का काम किया। उस दौर में जब यह शैली सीमित दायरों में सिमटती जा रही थी, तब उन्होंने देश और विदेश में इसके प्रचार-प्रसार का बीड़ा उठाया।

जिया फरीदुद्दीन डागर ने यूरोप के कई देशों में जाकर ध्रुपद की शिक्षा दी। ऑस्ट्रिया, फ्रांस और अन्य देशों में उनके शिष्यों की बड़ी संख्या थी। उनकी गायकी और शिक्षण शैली ने विदेशी विद्यार्थियों को भी भारतीय शास्त्रीय संगीत की ओर आकर्षित किया। कई छात्र विशेष रूप से उनसे सीखने के लिए भारत आते थे।

आगे चलकर उनका जुड़ाव भोपाल से हुआ, जहां ध्रुपद के संरक्षण और संवर्धन के लिए स्थापित ध्रुपद केंद्र की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। लगभग ढाई दशक तक उन्होंने वहां विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया। उनके शिष्यों में कई ऐसे कलाकार शामिल हैं जिन्होंने आगे चलकर ध्रुपद को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया।

संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने एक ऐसी कला परंपरा को नई जिंदगी दी, जिसे कभी विलुप्ति के कगार पर माना जा रहा था।

8 मई 2013 को उस्ताद जिया फरीदुद्दीन डागर का निधन हो गया।

--आईएएनएस

एमटी/पीएम