Dev Anand Birth Anniversary: जेब में थे सिर्फ 30 रुपये, मुंबई में क्लर्क की नौकरी से शुरू हुआ था सफर; ऐसे बने एवरग्रीन स्टार
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे रहे हैं, जिनकी पहचान सिर्फ उनकी फिल्मों तक सीमित नहीं रही। उनका अंदाज, संवाद बोलने का तरीका और पर्दे पर मौजूदगी कई पीढ़ियों तक याद की जाती है। देव आनंद भी ऐसे ही सितारों में शामिल थे, जिन्हें उनके खास स्टाइल के लिए आज भी याद किया जाता है।
लेकिन जिस शख्स ने आगे चलकर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अलग मुकाम बनाया, उसके मुंबई पहुंचने की कहानी आसान नहीं थी। साल 1943 में लाहौर से मुंबई पहुंचे देव आनंद की जेब में महज 30 रुपये थे। न कोई ठिकाना था और न ही फिल्मों में काम मिलने की गारंटी।
मुंबई में गुजारा करना था सबसे बड़ी चुनौती
मुंबई पहुंचने के बाद देव आनंद को शुरुआती दिनों में चॉल में रहना पड़ा। कुछ ही समय में उनके पास मौजूद पैसे खत्म होने लगे। अभिनय का सपना सामने था, लेकिन काम मिलने में वक्त लग रहा था।
आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने चर्चगेट स्थित मिलिट्री सेंसर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी की। यहां उन्हें करीब 65 रुपये महीने की तनख्वाह मिलती थी। बाद में उन्होंने एक अकाउंटिंग फर्म में भी क्लर्क के तौर पर काम किया, जहां उनकी सैलरी 85 रुपये थी।
हालांकि नौकरी उनकी मंजिल नहीं थी। उनका लक्ष्य फिल्मों में अभिनय करना था।
परिवार में भी था फिल्मों का कनेक्शन
देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के पंजाब के गुरदासपुर जिले में हुआ था। उनके पिता पिशोरी लाल आनंद पेशे से वकील थे और स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े हुए थे।
देव आनंद चार भाइयों में तीसरे थे। उनके बड़े भाई चेतन आनंद और छोटे भाई विजय आनंद भी फिल्म जगत से जुड़े। उनकी बहन शील कांता कपूर, फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां थीं।
देव आनंद ने डलहौजी के सेक्रेड हार्ट स्कूल से शुरुआती शिक्षा हासिल की और बाद में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए किया।
पढ़ाई के लिए पैसे नहीं मिले तो चुना एक्टिंग का रास्ता
देव आनंद आगे पढ़ना चाहते थे और लंदन जाकर उच्च शिक्षा हासिल करने का सपना भी देखते थे। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती थी। उनके पिता ने आगे की पढ़ाई का खर्च उठाने में असमर्थता जताई और उन्हें नौकरी करने की सलाह दी।
इसके बाद देव आनंद ने तय किया कि अगर संघर्ष करना ही है, तो क्यों न अपने बचपन के सपने को पूरा करने के लिए संघर्ष किया जाए। इसी सोच के साथ वह जून 1943 में लाहौर से ट्रेन पकड़कर मुंबई पहुंच गए।
चेतन आनंद से मिला थिएटर का रास्ता
मिलिट्री सेंसर ऑफिस में करीब एक साल नौकरी करने के बाद देव आनंद अपने बड़े भाई चेतन आनंद के साथ रहने लगे। चेतन उस समय इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) से जुड़े हुए थे।
यहीं देव आनंद को थिएटर और अभिनय की दुनिया को करीब से समझने का अवसर मिला। मंच पर काम करने के दौरान उनका आत्मविश्वास बढ़ा और फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने का रास्ता भी खुला।
साल 1946 में फिल्म ‘हम एक हैं’ से उन्हें फिल्मों में काम करने का मौका मिला।
एक शर्ट ने कराई गुरु दत्त से मुलाकात
‘हम एक हैं’ के दौरान देव आनंद और गुरु दत्त की दोस्ती की शुरुआत भी एक दिलचस्प घटना से हुई।
फिल्म के सेट पर सभी कलाकारों के कपड़े एक ही धोबी के पास जाते थे। एक दिन धोबी ने गलती से देव आनंद की सफेद शर्ट गुरु दत्त के कपड़ों के साथ भेज दी। गुरु दत्त ने वह शर्ट पहन ली और स्टूडियो पहुंच गए।
देव आनंद ने जब अपनी शर्ट गुरु दत्त के पास देखी तो दोनों की मुलाकात हुई। नाराज होने के बजाय दोनों इस घटना पर हंस पड़े। यही छोटा-सा संयोग आगे चलकर उनकी गहरी दोस्ती में बदल गया।
बाद में देव आनंद ने गुरु दत्त को ‘बाजी’ के निर्देशन का मौका दिया। 1951 में रिलीज हुई यह फिल्म गुरु दत्त के निर्देशन करियर के लिए अहम साबित हुई।
‘जिद्दी’ ने बदली करियर की दिशा
देव आनंद के करियर में ‘जिद्दी’ एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। अशोक कुमार ने उन्हें इस फिल्म में काम करने का अवसर दिया। फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद को इंडस्ट्री में पहचान मिलने लगी।
इसके बाद उन्होंने केवल अभिनय तक खुद को सीमित नहीं रखा। साल 1949 में उन्होंने अपने भाई चेतन आनंद के साथ नवकेतन फिल्म्स की शुरुआत की। इसी बैनर के तहत बनी ‘बाजी’ ने उनकी निर्माता के रूप में पहचान को भी मजबूत किया।
1950 के दशक में बन गए बड़े स्टार
1950 के दशक में देव आनंद की कई फिल्में दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुईं। ‘जाल’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘सीआईडी’, ‘पेइंग गेस्ट’ और ‘काला पानी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख सितारों में शामिल कर दिया।
उनकी सबसे अलग पहचान उनका बोलने का अंदाज, तेज संवाद अदायगी और कैमरे के सामने खास स्टाइल था। बातचीत के दौरान सिर हिलाने का उनका अंदाज भी दर्शकों के बीच उनकी पहचान बन गया।
‘Guide’ में रोमांटिक हीरो से अलग दिखे देव आनंद
1960 का दशक भी देव आनंद के करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा। ‘हम दोनों’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘गाइड’ जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को नई ऊंचाई दी।
साल 1965 में रिलीज हुई ‘गाइड’ उनके करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल रही। आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में उनके साथ वहीदा रहमान नजर आई थीं।
‘गाइड’ में देव आनंद ने ऐसा किरदार निभाया, जो उनकी पारंपरिक रोमांटिक हीरो वाली छवि से काफी अलग था। इस फिल्म ने उन्हें सिर्फ लोकप्रिय अभिनेता के तौर पर नहीं, बल्कि गंभीर और चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार के रूप में भी पहचान दिलाई।
लाहौर से मुंबई तक 30 रुपये लेकर पहुंचे उस युवा का यह सफर बताता है कि देव आनंद की स्टारडम की कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, बल्कि संघर्ष, मौके और लगातार आगे बढ़ते रहने की कहानी भी थी।