ममूटी के माथे पर तिलक लगाने पर विवाद, वीडियो में जाने सोशल मीडिया पर आलोचना के बीच बोले हरिश्री यूसुफ- ‘यह अतिथियों के स्वागत की परंपरा’
गुजरात में आयोजित नेशनल अवॉर्ड सेरेमनी के दौरान नेशनल अवॉर्ड विजेता अभिनेता ममूटी का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया। इस दौरान उनके माथे पर तिलक लगाया गया। तिलक का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद कुछ यूजर्स ने ममूटी की धार्मिक पहचान को लेकर सवाल उठाते हुए उनकी आलोचना शुरू कर दी। विवाद बढ़ने के बाद मलयालम अभिनेता और फिल्ममेकर हरिश्री यूसुफ ने सोशल मीडिया के जरिए ट्रोलर्स को जवाब दिया है।
ममूटी को हाल ही में फिल्म ‘भ्रमयुगम’ के लिए नेशनल फिल्म अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। अवॉर्ड समारोह से जुड़े कार्यक्रम के लिए जब वह गुजरात पहुंचे, तो उनके स्वागत के दौरान माथे पर तिलक लगाया गया। स्वागत का यह वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और इंस्टाग्राम पर कुछ यूजर्स ने इस पर आपत्ति जताई।कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने ममूटी के माथे पर तिलक लगाए जाने को उनके धर्म से जोड़ते हुए इसे इस्लाम के खिलाफ बताया। कुछ लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर आलोचना की। हालांकि, इस मामले में ममूटी की ओर से कोई आपत्ति या बयान सामने नहीं आया है।
विवाद के बीच मलयालम अभिनेता और फिल्ममेकर हरिश्री यूसुफ ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया। उन्होंने तिलक लगाए जाने को भारतीय परंपरा से जोड़ते हुए कहा कि अतिथियों का तिलक लगाकर स्वागत करना देश की कई पारंपरिक परंपराओं में शामिल है।हरिश्री यूसुफ ने अपने वीडियो में ट्रोलर्स को जवाब देते हुए कहा कि धर्म का उद्देश्य इंसानों को बेहतर बनाना है, न कि लोगों को एक-दूसरे से लड़ाना। उन्होंने कहा कि किसी अतिथि का पारंपरिक तरीके से स्वागत किए जाने को धर्म के खिलाफ बताना उचित नहीं है।
ममूटी को फिल्म ‘भ्रमयुगम’ में उनके अभिनय के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है। फिल्म में उन्होंने एक अलग तरह की भूमिका निभाई थी और उनके अभिनय को लेकर काफी चर्चा हुई थी। राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद गुजरात यात्रा के दौरान उनके पारंपरिक स्वागत का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसके बाद यह विवाद सामने आया।सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक तरफ कुछ यूजर्स ने तिलक को लेकर आपत्ति जताई, वहीं दूसरी ओर कई लोगों ने इसे सामान्य स्वागत परंपरा बताते हुए आलोचना पर सवाल उठाए हैं। हरिश्री यूसुफ ने भी इसी संदर्भ में धर्म और इंसानियत के व्यापक अर्थ पर जोर दिया है।