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‘बंदर’ में बड़ा मुद्दा, लेकिन कमजोर पड़ गई कहानी; वीडियो में जाने अनुराग कश्यप की फिल्म नहीं छोड़ती गहरा असर

 

निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्मों से दर्शकों को हमेशा कुछ अलग और विचारोत्तेजक देखने की उम्मीद रहती है। उनकी नई फिल्म बंदर भी एक ऐसे संवेदनशील और विवादास्पद विषय को केंद्र में रखती है, जिस पर लंबे समय तक बहस हो सकती है। फिल्म एक ऐसे ढलते हुए अभिनेता और गायक की कहानी कहती है, जिस पर गंभीर आरोप लगते हैं और जिसके बाद उसकी जिंदगी सोशल मीडिया, न्याय व्यवस्था और जेल की दुनिया के बीच उलझकर रह जाती है।

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दिलचस्प विषय, लेकिन अधूरी पड़ती पड़ताल

फिल्म का विषय शुरुआत में काफी आकर्षक और प्रासंगिक लगता है। सोशल मीडिया के दौर में किसी व्यक्ति पर लगे आरोप, जनता की राय और न्यायिक प्रक्रिया के बीच पैदा होने वाले संघर्ष को कहानी का आधार बनाया गया है। इसके साथ ही जेल के भीतर की परिस्थितियों और मानसिक दबाव को भी दिखाने की कोशिश की गई है।

हालांकि फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह अपने विषय की जटिलता को पूरी गहराई से समझने और दिखाने में सफल नहीं हो पाती। कहानी कई महत्वपूर्ण सवाल उठाती जरूर है, लेकिन उनके अलग-अलग पक्षों को संतुलित तरीके से सामने नहीं रखती।

एकतरफा नजरिया बनता है समस्या

फिल्म का फोकस मुख्य रूप से आरोपों का सामना कर रहे किरदार की पीड़ा और संघर्ष पर केंद्रित रहता है। इस वजह से कहानी का दूसरा पक्ष अपेक्षाकृत कमजोर नजर आता है। परिणामस्वरूप दर्शकों को पूरे घटनाक्रम का व्यापक दृष्टिकोण नहीं मिल पाता।जहां फिल्म को विभिन्न सामाजिक, कानूनी और नैतिक पहलुओं पर चर्चा खोलनी चाहिए थी, वहां वह कई बार केवल सहानुभूति पैदा करने तक सीमित रह जाती है। इससे कहानी का प्रभाव कुछ हद तक कम हो जाता है।

अभिनय और निर्देशन में दिखती है कश्यप की छाप

फिल्म के कलाकार अपने किरदारों के साथ न्याय करने की कोशिश करते हैं। निर्देशन में अनुराग कश्यप की शैली साफ दिखाई देती है। कई दृश्य प्रभावशाली हैं और कुछ संवाद सोचने पर मजबूर करते हैं। हालांकि मजबूत विषय होने के बावजूद पटकथा में कसाव की कमी महसूस होती है।

दर्शकों को सोचने से ज्यादा थकाती है फिल्म

‘बंदर’ एक ऐसा विषय चुनती है जो आज के समय में बेहद प्रासंगिक है। लेकिन फिल्म जिस तरह से अपने कथ्य को प्रस्तुत करती है, वह दर्शकों को गहरे विमर्श की ओर ले जाने के बजाय कई बार थका देती है। कहानी में संतुलन और विभिन्न दृष्टिकोणों की कमी इसे उस स्तर तक नहीं पहुंचने देती, जिसकी उम्मीद अनुराग कश्यप की फिल्मों से की जाती है।

फैसला

‘बंदर’ एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर बनी फिल्म है और इसकी मंशा सराहनीय है। लेकिन जटिल विषय को संतुलित और बहुआयामी तरीके से प्रस्तुत करने में यह पूरी तरह सफल नहीं हो पाती। यही वजह है कि फिल्म चर्चा तो पैदा करती है, लेकिन लंबे समय तक प्रभाव छोड़ने में पीछे रह जाती है।

रेटिंग: 2.5/5 ⭐⭐⭐☆☆

प्लस पॉइंट: दमदार विषय, कुछ प्रभावी दृश्य, अनुराग कश्यप की अलग शैली।
माइनस पॉइंट: एकतरफा दृष्टिकोण, कमजोर संतुलन, धीमी और थकाऊ प्रस्तुति।