अनुपम खेर ने छात्र आंदोलन के बाद भाषा की मर्यादा पर उठाए सवाल, वीडियो में बोले- 'असहमति जरूरी, लेकिन शब्दों का स्तर नहीं गिरना चाहिए'
छात्र आंदोलन समाप्त होने के बाद वरिष्ठ अभिनेता अनुपम खेर ने प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गई भाषा पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध और असहमति पूरी तरह जरूरी है, लेकिन अपनी बात रखते समय भाषा की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अभिनेता ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बचाव करते हुए राजनीतिक विमर्श में शालीनता बनाए रखने की अपील की।
अनुपम खेर ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों और संवाद की संस्कृति पर अपने विचार रखे। वीडियो के साथ लिखे गए कैप्शन में उन्होंने कहा कि "लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत हमारी आवाज है, लेकिन उसकी सबसे बड़ी खूबसूरती हमारी भाषा है।"उन्होंने आगे लिखा कि असहमति जताना जरूरी है, सवाल पूछना भी लोकतंत्र का हिस्सा है और सरकारों को जवाबदेह बनाना भी आवश्यक है। हालांकि, यदि विरोध के दौरान भाषा की मर्यादा खत्म हो जाती है, तो बात की गंभीरता और प्रभाव भी कम हो जाता है।
"हर वर्ग ने भाषा की मर्यादा तोड़ी"
अपने वीडियो में अनुपम खेर ने कहा कि हाल के घटनाक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन देखने को मिला। उन्होंने इस प्रवृत्ति पर चिंता जताते हुए कहा कि स्वस्थ लोकतंत्र में विचारों का टकराव होना स्वाभाविक है, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणी और अभद्र भाषा से बचना चाहिए।
"यह किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष का वीडियो नहीं"
अनुपम खेर ने स्पष्ट किया कि उनका वीडियो किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में नहीं है। उन्होंने लिखा,
"यह वीडियो किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह उस संस्कृति के पक्ष में है, जहां विचारों का संघर्ष हो सकता है, लेकिन शब्दों का पतन नहीं।"
उन्होंने लोगों से मतभेद रखने के साथ-साथ मर्यादा बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसके विचारों से नहीं, बल्कि उन्हें व्यक्त करने के तरीके से भी होती है।
सोशल मीडिया पर मिली मिली-जुली प्रतिक्रिया
अनुपम खेर की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने उनकी अपील का समर्थन करते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में शालीन भाषा का इस्तेमाल होना चाहिए, जबकि कुछ यूजर्स ने इसे मौजूदा राजनीतिक घटनाक्रम के संदर्भ में अलग-अलग नजरिए से देखा।गौरतलब है कि हाल के छात्र आंदोलनों और राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान कई नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों की ओर से इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर भी व्यापक बहस छिड़ी हुई है। ऐसे माहौल में अनुपम खेर की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक संवाद और सार्वजनिक विमर्श की मर्यादा को लेकर एक नई चर्चा का विषय बन गई है।