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5 साल की उम्र में लता मंगेशकर ने पकड़ ली थी पिता के शिष्य की गलती, ऐसे शुरू हुआ था संगीत का सफर

 

मुंबई, 27 सितंबर (आईएएनएस)। स्वरकोकिला लता मंगेशकर को कई पीढ़ियों ने सुना और महसूस किया है। उनकी आवाज में कभी प्यार, कभी दर्द, कभी भक्ति तो कभी देश के लिए जज्बा दिखाई दिया। सात दशक से ज्यादा लंबे करियर में उन्होंने हिंदी के साथ-साथ अन्य भाषाओं में भी हजारों गाने रिकॉर्ड किए, लेकिन इतनी बड़ी पहचान की शुरुआत बहुत छोटी उम्र में हुई थी।

करीब 5 साल की उम्र में लता ने अपने पिता के एक शिष्य को गाते हुए सुना और उन्हें लगा कि वह गलत गा रहे है। छोटी लता ने उन्हें सही सुर में गाकर समझाया। यही छोटी-सी घटना उनके संगीत के सफर में एक बड़ा मोड़ बन गई।

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर मराठी थिएटर के जाने-माने कलाकार और शास्त्रीय गायक थे। घर में संगीत का माहौल था और लता बचपन से अपने पिता को गाते और उनके शिष्यों को संगीत सिखाते हुए सुनती थीं। इसी माहौल में उनकी संगीत की समझ कम उम्र में बनने लगी। उनके परिवार में आगे चलकर आशा भोसले, उषा मंगेशकर, मीना मंगेशकर और हृदयनाथ मंगेशकर जैसे कलाकार भी संगीत से जुड़े।

लता ने एक पुराने इंटरव्यू में बताया था, जिसमें उनके पिता ने पहली बार उनकी सुर की समझ की ओर ध्यान दिया था। उन्होंने बताया था कि वह करीब 5 साल की थीं। उनके पिता का एक शिष्य घर में रियाज कर रहा था। लता ने उसकी आवाज सुनी और उन्हें लगा कि वह ठीक तरह से नहीं गा रहा। उन्होंने उसे रोककर वही राग अपने पिता से सुने तरीके से गाकर सुनाया। जब उनके पिता वापस आए तो उन्होंने बेटी से वही चीज दोबारा गाने को कहा। अगले दिन से दीनानाथ मंगेशकर ने लता को संगीत सिखाना शुरू कर दिया।

लता ने बचपन में अपने पिता के साथ मराठी थिएटर के नाटकों में भी काम किया और गाया लेकिन उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया, जब 1942 में उनके पिता का निधन हो गया। उस समय लता महज 13 साल की थीं। परिवार की जिम्मेदारी भी उनके कंधों पर आ गई। परिवार के करीबी मास्टर विनायक ने उन्हें एक्टिंग और सिंगिंग में आगे बढ़ने में मदद की। इसी दौरान लता ने फिल्मों के लिए गाना शुरू किया।

लता का पहला रिकॉर्ड किया गया गाना 1942 की मराठी फिल्म 'किती हसाल' के लिए था, लेकिन वह गाना फिल्म के अंतिम वर्जन में शामिल नहीं हुआ। इसके बाद उन्होंने कुछ और मराठी गाने रिकॉर्ड किए। 1945 के आसपास वह मुंबई पहुंचीं और आगे की संगीत की ट्रेनिंग ली। उन्होंने उस्ताद अमान अली खान और दूसरे बड़े संगीत गुरुओं से शास्त्रीय संगीत सीखा। इसके बाद उन्हें धीरे-धीरे हिंदी फिल्मों में काम मिलने लगा।

1949 की फिल्म 'महल' का गाना 'आएगा आनेवाला' लता के करियर का बड़ा मोड़ बना। इस गाने ने उनकी आवाज को देशभर में पहचान दिलाई। इसके बाद वह हिंदी सिनेमा की सबसे ज्यादा मांग वाली प्लेबैक सिंगर्स में शामिल हो गईं। उन्होंने नौशाद, मदन मोहन, एस.डी. बर्मन, अनिल बिस्वास, सी. रामचंद्र, खय्याम और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम किया। मोहम्मद रफी और किशोर कुमार जैसे बड़े गायकों के साथ भी उनकी आवाज खूब सुनी गई।

लता मंगेशकर ने 1963 में दिल्ली के रामलीला मैदान में 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाया था। यह गाना 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों को समर्पित था। इस मौके पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। लता की आवाज और गाने के भाव ने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया था।

उनके लंबे करियर में पुरस्कारों की भी लंबी लिस्ट रही। उन्हें 1969 में पद्म भूषण, 1989 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार और 1999 में पद्म विभूषण मिला। उन्होंने तीन बार सर्वश्रेष्ठ महिला प्लेबैक सिंगर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी जीता। साल 2001 में उन्हें देश के सबसे बड़े नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 2007 में फ्रांस ने भी उन्हें अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक, ऑफिसर ऑफ लीजन ऑफ ऑनर दिया।

लता मंगेशकर ने अपने जीवन के आखिरी दौर तक संगीत से रिश्ता बनाए रखा, हालांकि उम्र बढ़ने के साथ फिल्मों के लिए उनकी रिकॉर्डिंग कम होती गई। जनवरी 2022 में कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। करीब एक महीने के इलाज के बाद 6 फरवरी 2022 को 92 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

--आईएएनएस

पीके/वीसी