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UK Graduate Visa: भारतीय छात्रों को ब्रिटेन में पढ़ाई के बाद मिलेगा 2 साल रुकने का मौका, नए नियमों से बदलेगी यूनिवर्सिटी चुनने की रणनीति

 

ब्रिटेन में उच्च शिक्षा हासिल करने की योजना बना रहे भारतीय छात्रों के लिए राहत भरी खबर है। ब्रिटिश सरकार ने अपने बजट दस्तावेजों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए ग्रेजुएट वीजा यानी पोस्ट-स्टडी वर्क रूट की अवधि दो साल बनाए रखने का ऐलान किया है। इस सुविधा के जरिए योग्य छात्र ब्रिटेन में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी तलाशने और काम करने का अवसर हासिल कर सकेंगे। हालांकि, नए फ्रेमवर्क के तहत यह सुविधा उन्हीं विश्वविद्यालयों के ग्रेजुएट्स को मिलेगी, जो निर्धारित हाई-कॉम्प्लायंस मानकों पर खरे उतरेंगे।

ब्रिटिश सरकार की नई इमिग्रेशन नीति में क्या है खास?

ब्रिटेन सरकार का उद्देश्य देश में कुशल विदेशी प्रतिभाओं को आकर्षित करना और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देना है। नए बजट दस्तावेजों के अनुसार, सरकार यूरोप में हाई-स्किल्ड वर्कर्स के लिए अनुकूल माइग्रेशन सिस्टम विकसित करना चाहती है।

इस रणनीति के तहत कम और मध्यम कुशल श्रमिकों के लिए इमिग्रेशन नियम सख्त किए जा रहे हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं को आकर्षित करने के लिए कुछ सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। इसके अलावा, हाई पोटेंशियल इंडिविजुअल वीजा के दायरे में दुनिया के शीर्ष 150 रैंकिंग वाले संस्थानों के योग्य ग्रेजुएट्स को शामिल करने और इसकी सीमा बढ़ाने की भी बात कही गई है।

भारतीय छात्रों के लिए क्यों अहम है यह फैसला?

ब्रिटेन में पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों में भारतीयों की बड़ी हिस्सेदारी है। भारतीय युवाओं के लिए वहां से डिग्री हासिल करने के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम का अनुभव लेना भी करियर के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है।

पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा की अवधि दो साल बनाए रखने से योग्य भारतीय छात्रों को डिग्री पूरी करने के बाद ब्रिटेन में नौकरी तलाशने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा। इससे उन्हें वहां की कंपनियों के साथ जुड़ने और अपने करियर की संभावनाएं तलाशने का अवसर मिल सकता है।

यूनिवर्सिटी चुनते समय इन बातों पर देना होगा ध्यान

नई व्यवस्था के बाद भारतीय छात्रों के लिए विश्वविद्यालय का चयन पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा। अब केवल संस्थान की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग देखकर दाखिला लेना पर्याप्त नहीं होगा। छात्रों को यह भी देखना होगा कि संबंधित विश्वविद्यालय का रोजगार रिकॉर्ड कैसा है, कंपनियों के साथ उसके कितने मजबूत संबंध हैं और वहां से पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों को किस तरह के अवसर मिलते हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस बदलाव से यूनिवर्सिटी चयन का आधार रोजगार के नतीजे और संस्थान की विश्वसनीयता बन सकते हैं।

नए नियमों को लेकर अभी स्पष्टता जरूरी

हालांकि, इस फैसले के साथ कुछ सवाल भी जुड़े हुए हैं। ब्रिटिश सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि हाई-कॉम्प्लायंस विश्वविद्यालयों की पहचान किन मानकों के आधार पर की जाएगी और रोजगार के बेहतर परिणामों को किस तरह मापा जाएगा।

सितंबर 2027 के इनटेक की तैयारी कर रहे भारतीय छात्रों के लिए इन नियमों की स्पष्ट जानकारी बेहद जरूरी होगी। इससे वे विश्वविद्यालय में दाखिले, पढ़ाई के खर्च और भविष्य में नौकरी की संभावनाओं को ध्यान में रखकर बेहतर फैसला ले सकेंगे।