×

Teachers Day: जहाँ से शुरू हुआ संघर्ष, वहीं से मिली सफलता; जानिए कैसे संवरा युवाओं का भविष्य

 

शिक्षक दिवस सिर्फ शिक्षकों को सम्मान देने का दिन नहीं है, बल्कि उन लोगों की कहानियों को सामने लाने का भी अवसर है, जिन्होंने शिक्षा को बदलाव का जरिया बनाया। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी पुनर्जागरण समिति की है, जिसकी शुरुआत एक बेहद भावुक कर देने वाले दृश्य से हुई।

साल 2012 में बाबूलाल सिंह कनॉट प्लेस स्थित शिवाजी स्टेडियम के पास बस का इंतजार कर रहे थे। इसी दौरान उनकी नजर एक ऐसे बच्चे पर पड़ी, जो कूड़ेदान से खाना निकालकर खा रहा था। यह दृश्य देखकर बाबूलाल सिंह अंदर तक झकझोर उठे।

उन्होंने तय किया कि जरूरतमंद बच्चों के लिए कुछ ऐसा किया जाना चाहिए, जिससे उन्हें शिक्षा और बेहतर भविष्य का अवसर मिल सके। एक बच्चे को पढ़ाने से शुरू हुआ उनका प्रयास धीरे-धीरे एक बड़े अभियान में बदल गया।

आज पुनर्जागरण समिति छह राज्यों में 74 केंद्रों के जरिए करीब 6,530 विद्यार्थियों और लाभार्थियों तक पहुंच रही है।

अंग्रेजी कमजोर थी, केंद्र से जुड़कर बढ़ा आत्मविश्वास

बांदा के रहने वाले संजय प्रयागराज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी के लिए दिल्ली पहुंचे थे। उनकी पढ़ाई अच्छी थी, लेकिन अंग्रेजी भाषा में कमजोर होने की वजह से उन्हें कई परेशानियों का सामना करना पड़ता था।

इसके बाद वह समिति के अंग्रेजी बोलचाल केंद्र से जुड़े। यहां प्रशिक्षण लेने के बाद उनके अंदर आत्मविश्वास बढ़ने लगा। धीरे-धीरे उन्होंने खुद को बेहतर किया और बाद में उसी केंद्र में बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी संभाली।

आज संजय दिल्ली सरकार के एक विद्यालय में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

बच्चों को पढ़ाते-पढ़ाते खुद सीखी जिम्मेदारी

आदित्य ने आरके पुरम स्थित बाल संस्कार केंद्र से अपनी पढ़ाई शुरू की थी। परिवार की आर्थिक परिस्थितियां आसान नहीं थीं, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और दसवीं व बारहवीं की परीक्षा पास करने के बाद स्नातक की पढ़ाई भी पूरी की।

बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी मिलने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व में भी बड़ा बदलाव आया। पढ़ाने के अनुभव ने उनमें आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और नेतृत्व क्षमता को मजबूत किया।

आज आदित्य एक निजी कंपनी में अकाउंटेंट के तौर पर काम कर रहे हैं।

24 साल से शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं आरती कानूंगो

शिक्षिका आरती कानूंगो पिछले 24 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रही हैं। वह दिल्ली सरकार के सर्वोदय कन्या विद्यालय में अंग्रेजी भाषा की शिक्षिका हैं।

उनका योगदान सिर्फ कक्षा में पढ़ाने तक सीमित नहीं है। वह विद्यार्थियों के साथ कक्षा के बाहर भी जुड़ती हैं और उन्हें विभिन्न सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक करने का प्रयास करती हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार समेत कई सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2026 में आर्ट ऑफ लिविंग की ओर से उन्हें श्री श्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

संस्था से पढ़े, अब उसी संस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे शुभम

शुभम सिंह की कहानी भी इस बदलाव की मिसाल है। उन्होंने खुद पुनर्जागरण समिति के बांदा केंद्र से शिक्षा हासिल की थी।

संस्था के साथ रहते हुए उन्होंने पढ़ाई के साथ अनुशासन, आत्मविश्वास, नेतृत्व और सामाजिक जिम्मेदारी जैसे गुण सीखे। अपनी मेहनत और लगन से आगे बढ़ते हुए आज शुभम उसी समिति में सेंटर हेड की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

यानी जिस संस्था ने उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया, आज वह उसी संस्था के जरिए दूसरे बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में योगदान दे रहे हैं।

सिर्फ रटने की बजाय बच्चों को समझाने पर जोर

रोहिणी सेक्टर-15 स्थित राजकीय सहशिक्षा विद्यालय के पीजीटी अंग्रेजी शिक्षक जय राम भी पढ़ाने के पारंपरिक तरीके से आगे बढ़कर बच्चों की समझ विकसित करने पर जोर देते हैं।

उन्होंने करीब 22 वर्षों तक टीजीटी प्राकृतिक विज्ञान के शिक्षक के तौर पर अध्यापन किया। अंग्रेजी पढ़ाते समय उनका मकसद सिर्फ बच्चों को भाषा याद कराना नहीं, बल्कि उनके अंदर आलोचनात्मक सोच और समस्या का समाधान करने की क्षमता विकसित करना है।

उनका मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबों की जानकारी देना नहीं, बल्कि बच्चों को इस काबिल बनाना भी है कि वे अपने आसपास की परिस्थितियों को समझ सकें और सही फैसले ले सकें।

एक छोटी सी घटना से शुरू हुआ बड़ा बदलाव

बाबूलाल सिंह ने 2012 में कूड़ेदान से खाना निकालते बच्चे को देखा था। उस वक्त शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि वह एक दृश्य आगे चलकर हजारों बच्चों की जिंदगी बदलने वाली पहल की शुरुआत बनेगा।

एक बच्चे को पढ़ाने की कोशिश से शुरू हुआ यह सफर अब छह राज्यों के 74 केंद्रों तक पहुंच चुका है। इस कहानी में उन विद्यार्थियों की कामयाबी भी शामिल है, जिन्होंने शिक्षा हासिल करने के बाद खुद दूसरों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली।

यही वजह है कि शिक्षक दिवस पर ऐसी कहानियां याद दिलाती हैं कि एक शिक्षक या एक व्यक्ति की छोटी सी पहल भी किसी बच्चे की पूरी जिंदगी की दिशा बदल सकती है।