Report :10 साल में 94 हजार सरकारी स्कूल कम! नीति आयोग के आंकड़ों ने बढ़ाई चिंता, जानिए क्यों बदल रही है देश की शिक्षा व्यवस्था
नई दिल्ली: भारत की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर नीति आयोग की एक रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों ने नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले करीब एक दशक में देशभर में लगभग 94 हजार सरकारी स्कूलों की संख्या कम हुई है। यानी औसतन हर दिन करीब 25 स्कूलों के बंद या विलय होने के बराबर बदलाव हुआ।
इसी अवधि में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में भी करीब 2.26 करोड़ की कमी दर्ज की गई है। हालांकि, स्कूलों की संख्या कम होने का मतलब हर मामले में स्कूल पूरी तरह बंद होना नहीं है। कई जगह कम छात्र संख्या वाले स्कूलों का आसपास के दूसरे स्कूलों में विलय भी किया गया है।
11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख हुए सरकारी स्कूल
नीति आयोग के बताए आंकड़ों के अनुसार, सरकारी स्कूलों की संख्या करीब 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई। इस तरह लगभग 94 हजार स्कूलों की संख्या कम हुई।
इसके उलट इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली। इससे देश की स्कूली शिक्षा में सरकारी और निजी संस्थानों के बीच बदलते संतुलन की तस्वीर सामने आती है।
सरकारी स्कूलों में 2.26 करोड़ छात्रों की कमी
स्कूलों की संख्या में बदलाव के साथ सरकारी स्कूलों में छात्रों के दाखिले में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या करीब 2.26 करोड़ कम हुई।
हालांकि, इसे सीधे तौर पर शिक्षा से बच्चों के बाहर होने के रूप में देखना सही नहीं होगा। कई राज्यों में कम नामांकन वाले स्कूलों को नजदीकी बड़े स्कूलों में मर्ज किया गया है। ऐसे मामलों में स्कूल की संख्या घटती है, लेकिन विद्यार्थियों की पढ़ाई जारी रहती है।
आखिर क्यों कम हो रहे सरकारी स्कूल?
सरकारी स्कूलों की संख्या घटने के पीछे कोई एक कारण नहीं है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में परिस्थितियां अलग हो सकती हैं।
कम छात्र संख्या वाले छोटे स्कूलों का विलय इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है। इसके अलावा कई क्षेत्रों में जन्म दर में कमी, ग्रामीण इलाकों से शहरों की ओर पलायन और निजी स्कूलों के प्रति बढ़ता आकर्षण भी सरकारी स्कूलों में नामांकन को प्रभावित कर सकता है।
कुछ परिवार बेहतर सुविधाओं, अंग्रेजी माध्यम और दूसरी शैक्षणिक सुविधाओं की उम्मीद में बच्चों को निजी स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं।
निजी स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी
जहां सरकारी स्कूलों की संख्या में गिरावट आई है, वहीं निजी स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि भारत के शिक्षा क्षेत्र में अभिभावकों की पसंद और स्कूलों की संरचना दोनों बदल रहे हैं।
हालांकि, निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या को केवल सरकारी स्कूलों की कमजोरी से जोड़ना भी सही नहीं होगा। जनसंख्या में बदलाव, शहरीकरण और स्थानीय जरूरतों का भी इसमें योगदान हो सकता है।
सिर्फ उत्तर भारत का आंकड़ा नहीं
94 हजार स्कूलों का आंकड़ा पूरे भारत से संबंधित है। इसलिए इसे केवल उत्तर भारत के स्कूलों की स्थिति के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और अन्य राज्यों में स्कूलों की स्थिति और उन्हें मर्ज करने की नीतियां अलग-अलग हो सकती हैं। किसी खास राज्य की वास्तविक स्थिति जानने के लिए उसके अलग-अलग सरकारी आंकड़ों को देखना जरूरी होगा।
क्या यह शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है?
सरकारी स्कूलों की संख्या और नामांकन में इतनी बड़ी गिरावट निश्चित रूप से गंभीर चर्चा का विषय है। खासकर ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल शिक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
इसलिए जरूरी है कि स्कूलों के विलय के साथ बच्चों की दूरी, शिक्षकों की उपलब्धता, कक्षाओं की गुणवत्ता, बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाए।
कुल मिलाकर, आंकड़े भारत की स्कूली शिक्षा में हो रहे बड़े बदलाव की ओर इशारा करते हैं। असली सवाल केवल यह नहीं है कि कितने सरकारी स्कूल कम हुए, बल्कि यह भी है कि इन बदलावों के बाद बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा कितनी मिल रही है।