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क्रिमिनल हैकर से कितने अलग होते हैं एथिकल हैकर? जानिए CBSE की पोल खोलने वाले निसर्ग की दिलचस्प कहानी

 

CBSE के ऑन-स्क्रीन मार्किंग और री-इवैल्यूएशन सिस्टम में सामने आई तकनीकी खामियों ने एथिकल हैकिंग को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज कर दी है। दरअसल, 19 साल के एथिकल हैकर निसर्ग अधिकारी ने CBSE के री-इवैल्यूएशन पोर्टल में मौजूद कुछ गंभीर सुरक्षा कमियों की ओर ध्यान दिलाया था। उनका दावा था कि पोर्टल में ऐसी खामियां हैं, जिनका फायदा उठाकर कोई सिस्टम में सेंध लगा सकता है।बाद में उनकी ओर से बताई गई खामियों को गंभीरता से लिया गया और पोर्टल को सुरक्षित बनाने के लिए तकनीकी विशेषज्ञों और IIT की टीमों की मदद ली गई। खास बात यह रही कि निसर्ग के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके बजाय उन्हें IIT कानपुर से नौकरी का ऑफर मिला। रिपोर्ट के मुताबिक, वह वहां थ्रेट इंटेलिजेंस एक्सपर्ट के तौर पर काम करने वाले हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एथिकल हैकिंग क्या होती है और कब किसी सिस्टम में सेंध लगाना अपराध की श्रेणी में आ सकता है?

क्या होती है Ethical Hacking?

एथिकल हैकिंग का मतलब किसी कंप्यूटर सिस्टम, वेबसाइट, नेटवर्क या ऐप की सुरक्षा जांचना और उसमें मौजूद कमजोरियों को पहचानना है। इसका मकसद सिस्टम को नुकसान पहुंचाना या डेटा चोरी करना नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा को मजबूत करना होता है।

कंपनियां और सरकारी संस्थान अक्सर साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञों की मदद लेते हैं ताकि वे अपने सिस्टम की कमियों का पता लगा सकें। एथिकल हैकर यह जांचने की कोशिश करते हैं कि कोई वास्तविक साइबर अपराधी सिस्टम में किस तरह सेंध लगा सकता है और उस रास्ते को पहले ही बंद किया जा सके।

सामान्य हैकर और एथिकल हैकर में क्या अंतर है?

हर हैकर अपराधी नहीं होता। हैकिंग का इस्तेमाल किस उद्देश्य से और किस अनुमति के तहत किया गया है, यह काफी महत्वपूर्ण है।

ब्लैक हैट हैकर आमतौर पर बिना अनुमति किसी सिस्टम या अकाउंट में घुसने, डेटा चुराने, नुकसान पहुंचाने या जानकारी का गलत इस्तेमाल करने की कोशिश करते हैं। ऐसी गतिविधियां कानून के दायरे में अपराध हो सकती हैं।

वहीं एथिकल हैकर किसी सिस्टम की सुरक्षा जांचने के लिए अधिकृत तरीके से कमजोरियों को खोजते हैं। उनका उद्देश्य सिस्टम को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि उसकी सुरक्षा बढ़ाना होता है।

CBSE के मामले में क्या हुआ?

CBSE के री-इवैल्यूएशन पोर्टल को लेकर छात्रों को कई तरह की तकनीकी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था। कुछ छात्रों को पोर्टल एक्सेस करने और री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया पूरी करने में दिक्कतें आ रही थीं।

इसी दौरान निसर्ग अधिकारी ने पोर्टल की सुरक्षा से जुड़ी कुछ खामियों की पहचान की और उनके बारे में जानकारी साझा की। बाद में इन कमियों को दूर करने के लिए तकनीकी स्तर पर काम किया गया, जिससे छात्रों के लिए री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया को बेहतर तरीके से संचालित किया जा सके।

एथिकल हैकिंग करने पर कब हो सकती है कार्रवाई?

यहां सबसे जरूरी बात अनुमति की है। किसी वेबसाइट या सिस्टम की सुरक्षा जांच करने से पहले संबंधित संस्था की अनुमति होना महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति बिना अनुमति किसी सिस्टम में प्रवेश करता है, डेटा हासिल करता है, उसे बदलता है या नुकसान पहुंचाता है, तो मामला कानूनी कार्रवाई तक पहुंच सकता है।

इसलिए एथिकल हैकिंग और गैरकानूनी हैकिंग के बीच सबसे बड़ा अंतर उद्देश्य के साथ-साथ अनुमति और तय किए गए दायरे का होता है।

निसर्ग अधिकारी को मिला एथिकल हैकिंग का इनाम

निसर्ग अधिकारी के मामले में उनकी साइबर सिक्योरिटी क्षमता को सकारात्मक तरीके से देखा गया। रिपोर्ट के मुताबिक, IIT कानपुर ने उन्हें नौकरी का अवसर दिया है, जहां वह थ्रेट इंटेलिजेंस एक्सपर्ट के तौर पर काम करेंगे।

यह मामला दिखाता है कि साइबर सिक्योरिटी के क्षेत्र में कमजोरियों को पहचानने और उन्हें जिम्मेदारी से रिपोर्ट करने वाले विशेषज्ञों की कितनी जरूरत है। आज जब सरकारी संस्थानों से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियां डिजिटल सिस्टम पर निर्भर हैं, ऐसे में एथिकल हैकर्स साइबर सुरक्षा की पहली दीवार को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाते हैं।