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69 हजार शिक्षक भर्ती: सुप्रीम कोर्ट में BEd-BTC पर घमासान, 35 हजार शिक्षकों की नौकरी पर उठे सवाल
 

 

उत्तर प्रदेश की 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती का विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मंगलवार को मामले की सुनवाई करीब दो घंटे चली, जिसमें बीएड और बीटीसी अभ्यर्थियों की पात्रता के साथ-साथ आरक्षण और पहले से नियुक्त शिक्षकों की स्थिति पर भी अहम सवाल उठे। सुनवाई के दौरान कोर्ट की टिप्पणियों से संकेत मिला कि विवाद केवल आरक्षण प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि भर्ती के समय तय पात्रता और बाद में बदली कानूनी स्थिति भी मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
2018 में शुरू हुई थी 69 हजार पदों की भर्ती
उत्तर प्रदेश सरकार ने 4 दिसंबर 2018 को प्राथमिक स्कूलों में सहायक शिक्षकों के 69 हजार पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया था। इसके बाद 6 जनवरी 2019 को असिस्टेंट टीचर रिक्रूटमेंट एग्जामिनेशन यानी ATRE आयोजित की गई।
परीक्षा में सामान्य वर्ग के लिए 65 प्रतिशत और आरक्षित वर्ग के लिए 60 प्रतिशत न्यूनतम अंक निर्धारित किए गए थे। इन कटऑफ को लेकर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने अदालत का रुख किया। बाद में हाई कोर्ट की डबल बेंच और सुप्रीम कोर्ट में भी इस संबंध में चुनौती दी गई, जिसे खारिज कर दिया गया।
परीक्षा परिणाम आने के बाद करीब 1.40 लाख अभ्यर्थी सफल घोषित हुए। इसके बाद भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण के नियमों के पालन को लेकर विवाद सामने आया और मामला अदालत तक पहुंच गया।
BEd और BTC की पात्रता बनी बड़ा मुद्दा
इस मामले में अब बीएड और बीटीसी अभ्यर्थियों की पात्रता सबसे अहम सवालों में शामिल हो गई है। भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के समय बीएड डिग्री धारकों को भी पात्र माना गया था। उन्होंने आवेदन किया, परीक्षा दी और बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों का चयन भी हुआ।
बाद में प्राथमिक शिक्षक पद के लिए बीएड की पात्रता को लेकर कानूनी स्थिति में बदलाव का मुद्दा सामने आया। इसके बाद बीटीसी अभ्यर्थियों ने प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती में अपनी प्रशिक्षण योग्यता को अलग और अधिक उपयुक्त बताते हुए बीएड उम्मीदवारों के चयन पर सवाल उठाए।
कोर्ट ने 35 हजार BEd शिक्षकों पर पूछा सवाल
सुनवाई के दौरान बीएड उम्मीदवारों की ओर से दलील दी गई कि भर्ती के समय लागू एनसीटीई के प्रावधानों के तहत वे पात्र थे। इसी दौरान कोर्ट ने सवाल किया कि अगर करीब 35 हजार बीएड उम्मीदवार चयनित होकर पहले से शिक्षक के रूप में काम कर रहे हैं, तो उन्हें अब किस आधार पर हटाया जा सकता है।
पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि अगर ATRE के अंक चयन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण हैं और किसी बीएड उम्मीदवार के अंक किसी बीटीसी उम्मीदवार से अधिक हैं, तो केवल प्रशिक्षण योग्यता के आधार पर ज्यादा अंक पाने वाले बीएड उम्मीदवार को बाहर करने का आधार क्या होगा।
ATRE सिर्फ पात्रता परीक्षा थी या चयन का आधार?
सुनवाई में ATRE की भूमिका को लेकर भी अलग-अलग पक्षों की दलील सामने आई। आरक्षित वर्ग की ओर से कहा गया कि ATRE केवल पात्रता परीक्षा थी, इसे सीधे चयन परीक्षा नहीं माना जा सकता। उनका तर्क था कि परीक्षा पास करने मात्र से किसी अभ्यर्थी को नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता।
इस दौरान उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम 1994 और उससे जुड़े दस्तावेजों का भी उल्लेख किया गया। कोर्ट ने 23 मार्च 1994 के एक दस्तावेज की प्रकृति पर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया यह शासनादेश के बजाय पत्र या कार्यालयी आदेश जैसा प्रतीत होता है।
आरक्षण को लेकर क्या है विवाद?
69 हजार शिक्षक भर्ती में आरक्षण के नियमों के पालन को लेकर आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए हैं। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि ओबीसी और एससी वर्ग को निर्धारित आरक्षण के अनुपात में सीटें नहीं मिलीं।
आरक्षित वर्ग के पक्ष की ओर से ओबीसी को 27 प्रतिशत के बजाय 3.6 प्रतिशत और एससी वर्ग को 21 प्रतिशत के बजाय 16.2 प्रतिशत आरक्षण मिलने का दावा किया गया है। इसी विवाद के आधार पर लखनऊ हाई कोर्ट की डबल बेंच ने 13 अगस्त 2024 को चयन सूची को रद्द कर नई सूची तैयार करने का निर्देश दिया था।
अब सुप्रीम कोर्ट में तय होंगे कई अहम सवाल
मामले में अब सुप्रीम कोर्ट के सामने एक साथ कई महत्वपूर्ण सवाल हैं। इनमें भर्ती के समय बीएड उम्मीदवारों की पात्रता, बाद में बदली कानूनी स्थिति, ATRE की भूमिका, आरक्षण के नियमों का पालन और पहले से नियुक्त शिक्षकों के भविष्य जैसे मुद्दे शामिल हैं।
इसलिए 69 हजार शिक्षक भर्ती का फैसला सिर्फ नई चयन सूची तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर उन अभ्यर्थियों पर भी पड़ सकता है जो वर्षों से इस भर्ती प्रक्रिया और नियुक्ति से जुड़े विवाद का सामना कर रहे हैं। फिलहाल अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई और आदेश पर निर्भर करेगा।