नागौर का वो ‘चपरासी’, जिसकी एक जिद ने 22 साल बाद मां से मिलवाया; राजस्थान की वोटर लिस्ट बनी क्लाइमेक्स
राजस्थान के नागौर जिले में एक निजी स्कूल में चपरासी का काम करने वाला विनोद उर्फ विनोद गैरी अब सिर्फ एक साधारण कर्मचारी नहीं रह गया है। उसकी जिंदगी की कहानी ऐसी है, जिसने न सिर्फ प्रशासन को चौंकाया, बल्कि 22 साल बाद एक मां-बेटे को मिलवाने का रास्ता भी खोल दिया। इस पूरी कहानी का सबसे चौंकाने वाला मोड़ बना—राजस्थान की वोटर लिस्ट, जिसने इस लंबे ‘वनवास’ का क्लाइमेक्स तय कर दिया।
विनोद मूल रूप से मध्य प्रदेश के मंदसौर का रहने वाला है। 22 साल पहले उसने परिवार की मर्जी के खिलाफ पुष्पा से शादी की थी। सामाजिक विरोध और पारिवारिक नाराजगी इतनी गहरी थी कि दोनों को घर छोड़कर भागना पड़ा। इसके बाद उन्होंने राजस्थान को अपनी कर्मभूमि बनाया और नागौर में एक नई, गुमनाम जिंदगी शुरू की।
विनोद ने यहां मेहनत-मजदूरी से लेकर चपरासी की नौकरी तक का सफर तय किया। पत्नी और बच्चों के साथ वह एक सीमित दायरे में रहा, ताकि अतीत का कोई सिरा फिर से न खुल जाए। गांव, परिवार और यहां तक कि मां से भी उसका संपर्क पूरी तरह टूट गया। यह दूरी सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी थी।
लेकिन वक्त के साथ एक जिद ने जन्म लिया—अपनी पहचान को वैध बनाने की जिद। विनोद चाहता था कि उसके बच्चे बिना किसी डर के पढ़ें, बड़े हों और समाज में सम्मान के साथ रहें। इसी जिद के चलते उसने अपना नाम राजस्थान की वोटर लिस्ट में दर्ज करवाने की प्रक्रिया शुरू की।
वोटर आईडी के लिए जब दस्तावेजों की जांच हुई, तो विनोद का मूल पता मध्य प्रदेश के मंदसौर से जुड़ा निकला। प्रशासनिक स्तर पर सत्यापन शुरू हुआ। यहीं से कहानी ने नया मोड़ लिया। दस्तावेजों के जरिए मंदसौर प्रशासन तक सूचना पहुंची और 22 साल बाद विनोद की पहचान उसके पुराने घर से जुड़ गई।
सूत्रों के अनुसार, इसी प्रक्रिया के दौरान विनोद की मां तक यह जानकारी पहुंची कि उसका बेटा जिंदा है और राजस्थान में रह रहा है। वर्षों से बेटे को खो चुकी मां के लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। बाद में प्रशासन और स्थानीय लोगों की मदद से विनोद और उसकी मां की मुलाकात संभव हो सकी।
जब 22 साल बाद मां-बेटे आमने-सामने आए, तो भावनाओं का बांध टूट गया। वह पल सिर्फ एक पारिवारिक मिलन नहीं था, बल्कि उस समाज के लिए भी संदेश था, जो आज भी प्रेम विवाह करने वालों को बहिष्कृत कर देता है।
विनोद की कहानी यह दिखाती है कि कैसे एक आम नागरिक की लोकतांत्रिक पहचान—वोटर आईडी—उसके जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बन सकती है। यह सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, बल्कि पहचान, स्वीकार्यता और रिश्तों की वापसी का जरिया भी बन सकता है।