×

पेंडिंग ट्रायल के आधार पर नौकरी से इनकार नहीं कर सकता विभाग, फुटेज में जानें राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला

 

राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी नौकरी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल सड़क दुर्घटना से जुड़े किसी आपराधिक मामले का ट्रायल कोर्ट में लंबित (Pending Trial) होना, किसी चयनित अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी देने से इनकार करने का आधार नहीं बन सकता। जब तक किसी मामले में दोष सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक संबंधित व्यक्ति को कानून की नजर में निर्दोष माना जाएगा।

<a style="border: 0px; overflow: hidden" href=https://youtube.com/embed/1LWbeIVxLkA?autoplay=1&mute=1><img src=https://img.youtube.com/vi/1LWbeIVxLkA/hqdefault.jpg alt=""><span><div class="youtube_play"></div></span></a>" style="border: 0px; overflow: hidden;" width="640">

यह अहम फैसला जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की एकल पीठ ने सुनाया। कोर्ट ने आयुर्वेद विभाग की ओर से जारी उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत चयनित अभ्यर्थी बूंदी निवासी सुरेश कुमार मीणा की नियुक्ति रोक दी गई थी। हाईकोर्ट ने विभाग को निर्देश दिए हैं कि वह 30 दिनों के भीतर सुरेश कुमार मीणा को नियुक्ति प्रदान करे।

मामले के अनुसार, सुरेश कुमार मीणा का चयन आयुर्वेद विभाग में निर्धारित प्रक्रिया के तहत हो गया था। हालांकि, विभाग ने उसके खिलाफ सड़क दुर्घटना से जुड़े एक आपराधिक मामले में चार्जशीट दाखिल होने और ट्रायल पेंडिंग होने का हवाला देते हुए नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ सुरेश कुमार मीणा ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महज चार्जशीट दाखिल हो जाना या मामला अदालत में विचाराधीन होना, किसी व्यक्ति को अपराधी साबित नहीं करता। जब तक सक्षम न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध नहीं किया जाता, तब तक व्यक्ति को निर्दोष माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि विभाग का यह रवैया कानून के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि इस तरह के आदेश संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन हैं। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है। किसी व्यक्ति को बिना दोष सिद्ध हुए नौकरी से वंचित करना इन संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण ने कहा कि यदि केवल पेंडिंग ट्रायल के आधार पर नियुक्ति रोकी जाएगी, तो यह चयन प्रक्रिया को ही अर्थहीन बना देगा। इससे न केवल अभ्यर्थी के भविष्य पर नकारात्मक असर पड़ेगा, बल्कि निर्दोष व्यक्ति को भी अनावश्यक मानसिक और आर्थिक पीड़ा झेलनी पड़ेगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि विभागों को इस तरह के मामलों में संवेदनशील और कानूनसम्मत रवैया अपनाना चाहिए।

हाईकोर्ट के इस फैसले को सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हजारों अभ्यर्थियों के लिए राहत भरा माना जा रहा है। कई मामलों में देखा गया है कि मामूली या अनजाने में दर्ज मामलों के चलते चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति अटका दी जाती है। इस निर्णय से स्पष्ट संदेश गया है कि जब तक दोष साबित न हो, तब तक किसी भी अभ्यर्थी के अधिकार छीने नहीं जा सकते।