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आयकर विभाग ने वॉट्सऐप से पकड़ी कारोबारी की बेनामी संपत्ति, वीडियो में देखें 1 महीने में 4.53 करोड़ का ट्रांजेक्शन

 

जयपुर में इनकम टैक्स चोरी के एक बड़े मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने वॉट्सऐप चैट को आयकर विभाग की कार्रवाई में वैध सबूत मानते हुए आरोपी कारोबारी की याचिका को खारिज कर दिया है। यह फैसला आयकर कानून की धारा 153C के तहत 'अन्य दस्तावेज़ों' की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस चंद्रप्रकाश श्रीमाली की खंडपीठ ने की। कारोबारी पर आरोप था कि उसने जयपुर में खरीदी गई एक प्रॉपर्टी को अपने आय-व्यय के रिकॉर्ड में नहीं दिखाया और इस संबंध में कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया।

आयकर विभाग को जांच के दौरान आरोपी के एक मोबाइल फोन से वॉट्सऐप चैट के माध्यम से किए गए ₹4 करोड़ 52 लाख 62 हजार रुपए के लेनदेन के सबूत मिले। इन चैट्स में प्रॉपर्टी से जुड़ी बातचीत और पैसों के लेनदेन की स्पष्ट जानकारी दी गई थी, जिसे विभाग ने अपने केस में एक ठोस सबूत के तौर पर पेश किया।

कारोबारी की ओर से कोर्ट में यह दलील दी गई कि वॉट्सऐप चैट को ठोस दस्तावेज नहीं माना जा सकता और इसे केवल एक अनौपचारिक बातचीत का जरिया कहा जा सकता है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि डिजिटल तकनीक के युग में चैट, ईमेल, टेक्स्ट मैसेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उनमें स्पष्ट रूप से वित्तीय लेनदेन और संपत्ति से संबंधित बातचीत दर्ज हो।

धारा 153C के तहत आयकर विभाग को उन दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई करने की अनुमति है, जो किसी तीसरे व्यक्ति के पास से प्राप्त हुए हों और जो यह साबित करें कि संबंधित व्यक्ति कर चोरी में संलिप्त है। कोर्ट ने इसी आधार पर वॉट्सऐप चैट को "अन्य दस्तावेज़" की श्रेणी में रखा और इसे आयकर विभाग की कार्रवाई का मजबूत आधार माना।

इस फैसले के बाद अब यह स्पष्ट हो गया है कि आयकर विभाग की जांच में डिजिटल चैट, विशेषकर वॉट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म्स पर की गई बातचीत को कानूनी साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, बशर्ते कि वह प्रामाणिक हो और सीधे तौर पर संबंधित व्यक्ति को जोड़ती हो।

यह निर्णय भविष्य में आयकर और अन्य वित्तीय मामलों में डिजिटल संवाद को लेकर एक मील का पत्थर साबित हो सकता है, क्योंकि इससे यह भी तय हुआ कि टैक्स चोरी जैसे मामलों में डिजिटल सबूतों की कानूनी स्वीकार्यता बढ़ रही है।

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह फैसला अन्य राज्यों और मामलों में किस प्रकार की मिसाल पेश करता है। फिलहाल, कोर्ट के इस फैसले से यह संकेत साफ है कि डिजिटल युग में हर मैसेज की कीमत और जिम्मेदारी दोनों है।