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बिल्डर लोन के मामले में फ्लैट कब्जे पर हाई कोर्ट का अहम फैसला, फुटेज मे जाने सीधे रिट याचिका नहीं होगी स्वीकार

 

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी बिल्डर द्वारा लिए गए बैंक लोन के बदले किसी फ्लैट खरीदार की संपत्ति पर कब्जा करने का नोटिस जारी किया जाता है, तो इसके खिलाफ सीधे हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर नहीं की जा सकती। ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष को पहले डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल (DRT) का रुख करना होगा, क्योंकि सरफेसी एक्ट में इसके लिए प्रभावी वैकल्पिक कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।

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यह अहम फैसला जस्टिस सुनील बेनीवाल की एकल पीठ ने सुनाया है। कोर्ट ने जोधपुर निवासी राजीव भंडारी द्वारा दायर याचिका को सुनवाई योग्य नहीं मानते हुए खारिज कर दिया। इस मामले में अदालत ने 14 जनवरी 2026 को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसे 22 जनवरी 2026 को सार्वजनिक किया गया।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता राजीव भंडारी ने एक बिल्डर से फ्लैट खरीदा था। बाद में यह सामने आया कि बिल्डर ने उसी प्रोजेक्ट के खिलाफ बैंक से लोन लिया हुआ था। लोन चुकता नहीं होने पर बैंक ने सरफेसी एक्ट के तहत कार्रवाई करते हुए फ्लैट पर कब्जा करने का नोटिस जारी कर दिया। इससे आहत होकर फ्लैट खरीदार ने सीधे हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की और बैंक की कार्रवाई को चुनौती दी।

हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि जब किसी कानून में प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो, तो सीधे रिट याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि सरफेसी एक्ट के तहत बैंक की कार्रवाई के खिलाफ डीआरटी में अपील का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है। ऐसे में याचिकाकर्ता को पहले उसी मंच पर अपनी बात रखनी चाहिए थी।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि हाई कोर्ट का रिट क्षेत्राधिकार असाधारण परिस्थितियों में ही इस्तेमाल किया जाता है। यदि वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं, तो पहले उनका उपयोग किया जाना आवश्यक है। केवल इस आधार पर कि मामला संपत्ति और आवास से जुड़ा है, हाई कोर्ट सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि फ्लैट खरीदारों की परेशानी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। डीआरटी ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए सक्षम मंच है, जहां बैंक और खरीदार दोनों अपनी-अपनी दलीलें रख सकते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला रियल एस्टेट और बैंकिंग सेक्टर से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है। इससे यह संदेश साफ गया है कि बिल्डर और बैंक के बीच हुए वित्तीय लेन-देन के विवादों में फ्लैट खरीदारों को भी सही कानूनी मंच का चयन करना होगा।

इस फैसले का असर उन सैकड़ों मामलों पर भी पड़ सकता है, जहां बिल्डर की लापरवाही या कर्ज के चलते निर्दोष फ्लैट खरीदारों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। हालांकि, हाई कोर्ट ने यह रास्ता जरूर दिखाया है कि ऐसे मामलों में राहत पाने के लिए डीआरटी एक प्रभावी मंच है।

कुल मिलाकर, राजस्थान हाई कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ कानून की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी बताता है कि न्याय पाने के लिए सही मंच का चुनाव करना कितना जरूरी है।