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जैसलमेर में दुर्लभ कैरेकल बिल्ली की मौजूदगी, फुटेज में देखें वन विभाग ने शुरू की मॉनिटरिंग

 

राजस्थान के जैसलमेर जिले में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। जैसलमेर वन विभाग को शाहगढ़ क्षेत्र में दुर्लभ और लुप्तप्राय कैरेकल बिल्ली मिली है। इसे लेकर अब वन विभाग ने इस प्रजाति की वैज्ञानिक मॉनिटरिंग शुरू कर दी है। शाहगढ़ क्षेत्र की ग्राम पंचायत शाहगढ़ के घोटारू गांव में एक नर कैरेकल को पकड़कर उसे रेडियो कॉलर पहनाया गया और फिर सुरक्षित तरीके से जंगल में छोड़ दिया गया।

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राजस्थान में कैरेकल जैसी दुर्लभ प्रजाति की मॉनिटरिंग के लिए यह कदम बेहद अहम माना जा रहा है। यह पूरा अभियान भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के विशेषज्ञों और राजस्थान वन विभाग की संयुक्त टीम ने अंजाम दिया। यह जटिल और संवेदनशील ऑपरेशन रविवार, 25 जनवरी की रात को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। ऑपरेशन के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि जानवर को किसी तरह का नुकसान न पहुंचे।

विशेषज्ञों के अनुसार, कैरेकल एक अत्यंत शर्मीला और बेहद फुर्तीला वन्यजीव है। इसकी मौजूदगी का पता लगाना और इसे देख पाना भी आसान नहीं होता। यही कारण है कि राजस्थान में इसकी संख्या को लेकर लंबे समय से सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं थे। कैरेकल अपनी खास शिकार शैली के लिए जाना जाता है। यह बिल्ली ऊंची छलांग लगाकर हवा में उड़ रहे पक्षियों को भी शिकार बना लेती है, जो इसे अन्य जंगली बिल्लियों से अलग बनाता है।

रेडियो कॉलर लगाए जाने के बाद अब कैरेकल की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा सकेगी। वन विभाग और WII के वैज्ञानिकों को इसके आवागमन, शिकार के पैटर्न, रहवास क्षेत्र और व्यवहार से जुड़ा सटीक वैज्ञानिक डेटा मिलेगा। इस डेटा के आधार पर भविष्य में इस प्रजाति के संरक्षण और उसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की बेहतर रणनीति तैयार की जा सकेगी।

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि थार मरुस्थल और आसपास के क्षेत्रों में कैरेकल का पाया जाना जैव विविधता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि इस क्षेत्र में अब भी दुर्लभ वन्यजीवों के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद हैं। हालांकि, बदलते पर्यावरण, मानव गतिविधियों और आवास में कमी के कारण इस प्रजाति के सामने खतरे भी बने हुए हैं।

अधिकारियों ने बताया कि मॉनिटरिंग के दौरान मिलने वाली जानकारी को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर वन्यजीव संरक्षण योजनाओं में शामिल किया जाएगा। इससे कैरेकल को लुप्त होने से बचाने और इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाने में मदद मिलेगी।