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जैसलमेर में 20 करोड़ साल पुराने जीवाश्म की खोज, वीडियो में देंखे वैज्ञानिकों ने कहा — ‘भारत का जुरासिक पार्क’ बनने की राह पर थार का रेगिस्तान

 

राजस्थान का रेगिस्तान एक बार फिर इतिहास के सबसे पुराने रहस्यों को उजागर कर रहा है। जैसलमेर के मेघा गांव में वैज्ञानिकों को लगभग 20 करोड़ साल पुराने मगरमच्छ जैसे समुद्री जीव के जीवाश्म मिले हैं। यह खोज न केवल भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भी प्रमाणित करती है कि आज का यह रेतीला क्षेत्र कभी विशाल टेथिस सागर का हिस्सा हुआ करता था।

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पुरातात्विक खोज में बड़ा खुलासा
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जीवाश्म जुरासिक काल (Jurassic Era) का है — वह समय जब पृथ्वी पर डायनासोर और समुद्री सरीसृपों का साम्राज्य था। जैसलमेर के मेघा गांव में मिले इन जीवाश्मों का आकार और बनावट मगरमच्छ जैसे जीवों से मेल खाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रजाति लगभग 20 करोड़ वर्ष पहले समुद्र की गहराइयों में रहती थी, और समय के साथ भौगोलिक परिवर्तनों ने इस पूरे इलाके को समुद्र से रेगिस्तान में बदल दिया।

जैसलमेर बना ‘जियो-पैलियंटोलॉजिकल हॉटस्पॉट’
पिछले कुछ वर्षों में जैसलमेर और उसके आसपास के क्षेत्रों में डायनासोर, समुद्री जीवों और प्राचीन वृक्षों के जीवाश्मों की कई महत्वपूर्ण खोजें हुई हैं। इन खोजों ने इस क्षेत्र को भारत का सबसे बड़ा ‘जियो-पैलियंटोलॉजिकल हॉटस्पॉट’ (Geo-Paleontological Hotspot) बना दिया है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) और देश के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों की शोध टीमें इस इलाके में लगातार अध्ययन कर रही हैं।

वैज्ञानिकों की नजर में ‘इंडिया का जुरासिक पार्क’
इस ताजा खोज के बाद जैसलमेर को लेकर अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की दिलचस्पी और बढ़ गई है। ब्रिटेन, फ्रांस और जापान के कई संस्थानों के शोधकर्ता इस क्षेत्र में अध्ययन के लिए आने की योजना बना रहे हैं।
भारतीय पुराजीव वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसलमेर की मिट्टी में जुरासिक काल के जीवों और पेड़-पौधों के अवशेष बड़ी संख्या में मौजूद हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर शोध और संरक्षण का काम योजनाबद्ध तरीके से किया जाए, तो आने वाले वर्षों में जैसलमेर को ‘इंडिया का जुरासिक पार्क’ घोषित किया जा सकता है।

टेथिस सागर के प्रमाण
भूवैज्ञानिकों का कहना है कि करोड़ों साल पहले एशिया और अफ्रीका के बीच फैला टेथिस सागर धीरे-धीरे सूख गया था, और उसकी तलहटी में मौजूद जीवाश्म आज थार रेगिस्तान की गहराइयों में दबे हुए हैं। इस खोज ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जैसलमेर का यह रेगिस्तानी इलाका कभी समुद्र की लहरों के नीचे था।

पर्यटन और विज्ञान दोनों को मिलेगा बढ़ावा
इस खोज के बाद जैसलमेर न केवल इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है, बल्कि इससे राज्य के जियो-टूरिज्म (Geo-Tourism) को भी नया प्रोत्साहन मिलेगा। राजस्थान सरकार पहले से ही इस क्षेत्र में “फॉसिल पार्क” विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।

विशेषज्ञों की राय
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के एक वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया, “यह खोज भारत के प्राचीन समुद्री जीवन और भूगर्भीय विकास की कहानी को समझने में एक बड़ा अध्याय जोड़ती है। जैसलमेर में मौजूद चूना पत्थर की परतें दरअसल उस समुद्री तल का हिस्सा हैं, जहाँ करोड़ों वर्ष पहले ये जीव रहते थे।”