एकल पट्टा प्रकरण, वीडियो में देंखे हाईकोर्ट में शांति धारीवाल की याचिका में विवाद
राजस्थान के एकल पट्टा प्रकरण में हाईकोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई के दौरान सरकार ने स्पष्ट किया कि पूर्व मंत्री शांति धारीवाल का नाम न तो FIR में था और न ही उन्हें चालान में आरोपी बनाया गया। इसके आधार पर सरकार ने कहा कि हाईकोर्ट में दायर उनकी याचिका मेंटिनेबल (चलने योग्य) नहीं है।
सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा की बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू और स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अनुराग शर्मा ने अदालत को बताया कि इस मामले में वास्तविक आरोपी केवल जीएस संधू, निष्काम दिवाकर और औंकारमल सैनी हैं।
सरकार ने कोर्ट को बताया कि शांति धारीवाल का इस प्रकरण से कोई कानूनी संबंध नहीं है। FIR और चालान की प्रतियों का हवाला देते हुए कहा गया कि केवल नामित आरोपियों के खिलाफ ही जांच और कानूनी कार्रवाई हुई है। इस आधार पर याचिका को खारिज करने की मांग की गई।
वकीलों और विशेषज्ञों का कहना है कि हाईकोर्ट में याचिका की मेंटिनेबिलिटी एक महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। यदि किसी व्यक्ति का नाम FIR या चालान में नहीं है, तो उस व्यक्ति की याचिका को सामान्यत: अदालत में स्वीकार नहीं किया जाता। अदालत इस बिंदु पर तय करेगी कि याचिका पर आगे सुनवाई होगी या नहीं।
सुनवाई के दौरान याचिका पक्ष ने तर्क दिया कि पूर्व मंत्री शांति धारीवाल पर भी जांच होनी चाहिए क्योंकि मामले से जुड़ी कुछ गतिविधियों का संदेह उन पर भी था। लेकिन सरकार की ओर से दायर स्पष्टीकरण में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों और चालान के अनुसार शांति धारीवाल इस मामले में आरोपी नहीं हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनवाई राजस्थान में राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। एकल पट्टा प्रकरण लंबे समय से विवादों में रहा है और इसमें कई उच्चस्तरीय अधिकारियों और नेताओं के नाम सामने आए थे। अब हाईकोर्ट का निर्णय इस मामले में दिशा-निर्देश तय करेगा कि कौन-कौन से पक्ष कानूनी रूप से जिम्मेदार हैं।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि शांति धारीवाल की याचिका स्वीकार होगी या खारिज कर दी जाएगी। इस फैसले का प्रभाव न केवल इस प्रकरण पर होगा, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों में उच्चस्तरीय नेताओं और अधिकारियों की कानूनी जिम्मेदारी तय करने में भी मार्गदर्शन मिलेगा।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी पक्षों से तर्क और सबूत पूरी तरह से प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, अदालत ने जांच एजेंसियों को भी सूचित किया कि केवल FIR और चालान में नामित आरोपियों के खिलाफ ही कार्रवाई होगी।
राजनीतिक और प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला राजस्थान में नीतिगत और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में भी संकेत देता है। हाईकोर्ट का निर्णय कानूनी रूप से महत्वपूर्ण है और इससे जनता के बीच न्यायपालिका की निष्पक्षता और भरोसे का भी मूल्यांकन होगा।