जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल, संतोष देसाई ने भारतीय समाज में बदलाव के विरोध पर किया चर्चा
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के चारबाग स्थल में आयोजित ‘जेन Z, मिलेनियल्स और मम्मीजी’ सत्र में लेखक और समाजशास्त्री संतोष देसाई ने भारतीय समाज में बदलाव और विकास की मानसिकता पर गहन विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारत एक महाशक्ति बनने की क्षमता रखता है, लेकिन उसमें परिवर्तन का विरोध करने की अद्भुत क्षमता भी है।
संतोष देसाई ने अपने विचारों में बताया कि भारतीय समाज ने खुद को इस तरह ढाला है कि वह प्रगति चाहता है, लेकिन असल बदलाव से कतराता है। उनका कहना था कि यह आज का केंद्रीय मुद्दा है। समाज विकास की बातों और बड़े-बड़े लक्ष्यों को सुनना पसंद करता है, लेकिन जब कोई मूलभूत परिवर्तन लाया जाता है, तो उसका विरोध स्वाभाविक रूप से सामने आता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक बदलाव के क्षेत्रों में कई योजनाएं बनी हैं, लेकिन अक्सर उनका क्रियान्वयन और स्वीकार्यता सामाजिक मानसिकता की जकड़न के कारण प्रभावित होती है। देसाई ने बताया कि यह विरोध केवल सामाजिक स्तर पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और पारिवारिक स्तर पर भी देखा जा सकता है। लोग नए तरीकों, तकनीकी बदलाव और नीतिगत सुधारों के प्रति संदेह और झिझक महसूस करते हैं।
सत्र में उन्होंने जेन Z और मिलेनियल्स की सोच पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि युवा वर्ग बदलाव और नवाचार के पक्ष में है, लेकिन पुराने सामाजिक तंत्र और पारिवारिक दबाव उन्हें कई बार सीमित कर देते हैं। इसके बावजूद, युवा वर्ग समाज में परिवर्तन की उम्मीद और ऊर्जा लेकर आगे बढ़ रहा है।
संतोष देसाई ने यह भी कहा कि भारत की शक्ति केवल उसकी संख्या या संसाधनों में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, ज्ञान और विविधता में निहित है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यदि समाज मूलभूत बदलाव के प्रति खुला और तैयार होता, तो भारत महाशक्ति बनने की राह पर तेजी से आगे बढ़ सकता है।
सत्र में उपस्थित दर्शकों ने लेखक की बातों पर गहन ध्यान दिया और कई सवालों के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक बदलावों के महत्व पर बहस भी हुई। देसाई ने इस बात पर जोर दिया कि वास्तविक विकास और प्रगति तभी संभव है जब समाज परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हो।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के आयोजकों ने इस सत्र को विशेष रूप से युवा वर्ग और परिवारों के लिए डिज़ाइन किया था, ताकि वे समाज में बदलाव, परंपरा और आधुनिकता के संतुलन पर विचार कर सकें।
इस प्रकार, संतोष देसाई का यह सत्र केवल विचारों का आदान-प्रदान नहीं था, बल्कि भारतीय समाज में बदलाव और प्रगति के बीच विरोधाभास को उजागर करने वाला महत्वपूर्ण मंच भी साबित हुआ।