राजस्थान बन सकता है देश का ‘ऑयल कैपिटल’: तिलहन क्रांति की ओर बढ़ता राज्य, उत्पादन में आत्मनिर्भरता की नई तस्वीर
राजस्थान तेजी से देश का ‘ऑयल कैपिटल’ बनने की दिशा में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। बढ़ती खाद्य तेल खपत और आयात पर होने वाले भारी विदेशी मुद्रा खर्च के बीच विशेषज्ञों ने राज्य में तिलहन उत्पादन को एक “नई कृषि क्रांति” के रूप में विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया है।
कृषि क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार, राजस्थान न केवल अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा कर रहा है, बल्कि कई तिलहन फसलों के मामले में उत्पादन क्षमता जरूरत से दोगुनी तक पहुंच चुकी है। सरसों जैसी प्रमुख फसल ने राज्य को तिलहन उत्पादन के नक्शे पर एक मजबूत पहचान दिलाई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आधुनिक कृषि तकनीक, सिंचाई सुविधाओं और बीज गुणवत्ता में सुधार को और बढ़ावा दिया जाए तो राजस्थान देश के खाद्य तेल आयात पर निर्भरता को काफी हद तक कम करने में अहम भूमिका निभा सकता है। वर्तमान में भारत को बड़ी मात्रा में खाद्य तेल आयात करना पड़ता है, जिससे अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।
राजस्थान के किसानों ने भी तिलहन खेती को अपनाकर बेहतर आय का जरिया बनाया है। खासकर सरसों, मूंगफली और सोयाबीन जैसी फसलों की खेती में लगातार वृद्धि देखी जा रही है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है और कृषि क्षेत्र में नए रोजगार के अवसर भी पैदा हो रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि राज्य की जलवायु तिलहन उत्पादन के लिए अनुकूल है, लेकिन उत्पादन क्षमता को और बढ़ाने के लिए सिंचाई विस्तार, ड्रिप इरिगेशन और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों की उपलब्धता जरूरी है।
सरकारी स्तर पर भी तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनमें किसानों को तकनीकी सहायता, सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत खरीद की व्यवस्था शामिल है।
यदि यह रफ्तार जारी रहती है, तो राजस्थान आने वाले वर्षों में न केवल देश का प्रमुख तिलहन उत्पादक राज्य बन सकता है, बल्कि खाद्य तेल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।