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राजस्थान की जेलों में जेल में कैदियों को एक दिन कपड़े धोने की अनुमति, फुटेज में जानें हाईकोर्ट ने कहा, कैदी भी इंसान, तत्काल नीति बनाने के निर्देश

 

राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों को पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह जेलों में पीने के पानी, कपड़े धोने के लिए पर्याप्त पानी और स्वच्छता व स्वास्थ्य सुविधाओं को सुनिश्चित करने के लिए तत्काल एक प्रभावी नीति बनाए। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि कैदियों को मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करने को मजबूर करना संविधान और मानवाधिकारों के खिलाफ है।

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यह अहम टिप्पणी जस्टिस अनूप ढंढ की एकल पीठ ने पीपल्स वॉच राजस्थान की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिका में प्रदेश की जेलों में कैदियों को मिल रही सुविधाओं की बदहाल स्थिति को उजागर किया गया था। सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य रखा गया कि कई जेलों में कैदियों को पीने के लिए साफ पानी तक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है, जबकि कपड़े धोने और व्यक्तिगत स्वच्छता के लिए पानी की व्यवस्था बेहद सीमित है।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस नियम पर भी कड़ी टिप्पणी की, जिसमें कैदियों को सप्ताह में केवल एक बार कपड़े धोने की अनुमति दी जाती है। अदालत ने कहा कि राजस्थान जैसे गर्म और शुष्क राज्य में यह नियम “कल्पना से परे” है। जस्टिस अनूप ढंढ ने सवाल उठाया कि ऐसी परिस्थितियों में कोई व्यक्ति स्वच्छ और स्वस्थ कैसे रह सकता है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक गर्मी, सीमित पानी और खराब स्वच्छता का सीधा असर कैदियों के स्वास्थ्य पर पड़ता है, जो किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि जेलों में बंद कैदियों को पीने के साफ पानी, कपड़े धोने के लिए पर्याप्त पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ रहा है। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह राज्य की जिम्मेदारियों पर भी सवाल खड़े करती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कैदी होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित कर दिया जाए।

महिला कैदियों और किशोर बंदियों के संदर्भ में हाईकोर्ट ने विशेष चिंता जाहिर की। अदालत ने कहा कि महिलाओं और किशोरों की आवश्यकताएं सामान्य कैदियों से अलग और विशेष होती हैं। उनके लिए स्वच्छता, स्वास्थ्य और व्यक्तिगत देखभाल से जुड़ी सुविधाएं और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में राज्य सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह इनके लिए अलग और संवेदनशील व्यवस्था करे।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि वह जेलों में मौजूदा हालात का गंभीरता से आकलन करे और एक ऐसी नीति बनाए, जिससे सभी जेलों में न्यूनतम मानकों के अनुसार सुविधाएं सुनिश्चित की जा सकें। अदालत ने संकेत दिए कि भविष्य में इस मामले की प्रगति की निगरानी भी की जा सकती है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह आदेश न केवल राजस्थान की जेल व्यवस्था में सुधार की दिशा में अहम कदम है, बल्कि यह कैदियों के अधिकारों को लेकर एक मजबूत संदेश भी देता है। अब यह देखना होगा कि राज्य सरकार इन निर्देशों को कितनी गंभीरता से लागू करती है।