JLF में जावेद अख्तर के बेबाक बयान, वीडियो में देखें बोले सेक्युलरिज़्म का क्रैश कोर्स नहीं होता
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में बॉलीवुड के मशहूर गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर ने अपने बेबाक और स्पष्ट विचारों से एक बार फिर सुर्खियां बटोरीं। अलग-अलग सत्रों में शामिल हुए जावेद अख्तर ने सेक्युलरिज़्म, भाषाओं के इतिहास और समाज में भाषा की भूमिका पर खुलकर अपनी बात रखी। उनके बयानों ने श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया।
सेशन ‘जावेद अख्तर: पॉइंट्स ऑफ व्यू’ में राइटर वरीशा फरासत के साथ बातचीत करते हुए जावेद अख्तर ने सेक्युलरिज़्म को लेकर कहा कि इसका कोई “क्रैश कोर्स” नहीं होता। उन्होंने कहा, “सेक्युलर कोई सिखाने की चीज़ नहीं है। अगर कोई सिखाएगा तो वो फेक होगा। सेक्युलर आपको आपके आसपास के माहौल से मिलता है।” जावेद अख्तर ने बताया कि उन्हें यह सोच अपने नाना और नानी से मिली, जिन्होंने बचपन से ही उन्हें इंसानियत और सह-अस्तित्व के मूल्य सिखाए।
भाषाओं को लेकर चलने वाली बहस पर भी जावेद अख्तर ने साफ रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि “संस्कृत पहले आई या उर्दू, यह सवाल ही गलत है।” उनके मुताबिक संस्कृत हजारों साल पुरानी भाषा है, जबकि उर्दू अभी बहुत नई है। उन्होंने उर्दू को “कल की बच्ची” बताते हुए कहा कि तमिल दुनिया की सबसे पुरानी जीवित भाषा है। अख्तर ने यहां तक कहा कि उर्दू इस तुलना की “रेस में ही नहीं है।”
जावेद अख्तर अपने अंदाज़ के लिए भी जाने जाते हैं। जब उनसे चश्मा न लगाने को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने मज़ाकिया लहजे में कहा, “अच्छे चेहरों को देखें, अच्छी नीयत रखें। चश्मा नहीं लगेगा।” इस जवाब पर सभागार में मौजूद दर्शकों की हंसी और तालियों से माहौल हल्का हो गया।
वहीं, एक अन्य सत्र ‘इंडिया इन उर्दू: उर्दू इन इंडिया’ में जावेद अख्तर ने उर्दू भाषा को लेकर विवादित लेकिन स्पष्ट बयान दिया। उन्होंने कहा कि उर्दू भाषा ने पाकिस्तान के टुकड़े करवाए। उनके मुताबिक भारत में बसे कुछ लोग जो सिर्फ उर्दू को ही अपनी पहचान मानते हैं, वे समाज में तनाव की स्थिति बनाए रखते हैं। जावेद अख्तर ने जोर देकर कहा कि भाषा कभी भी धर्म या समाज की नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा, “भाषा हमेशा रीजन यानी क्षेत्र की होती है, रिलीजन यानी धर्म की नहीं।” जावेद अख्तर ने यह भी कहा कि किसी भाषा को किसी एक धर्म या समुदाय से जोड़ना गलत है और इससे समाज में अनावश्यक विभाजन पैदा होता है। उनके अनुसार भाषाएं लोगों को जोड़ने का माध्यम होती हैं, न कि तोड़ने का।
जावेद अख्तर के ये बयान JLF में चर्चा का केंद्र बने रहे। उनके विचारों को लेकर जहां कुछ लोगों ने समर्थन जताया, वहीं कुछ ने असहमति भी व्यक्त की। हालांकि, यह साफ दिखा कि जावेद अख्तर ने एक बार फिर बिना किसी लाग-लपेट के अपने विचार रखे और साहित्यिक मंच को सामाजिक विमर्श का केंद्र बना दिया।