जावेद अख्तर बोले हिन्दी और उर्दू 'खड़ी बोली’ की बेटियां, वीडियो में देखें बोले - भाषा का संबंध किसी धर्म से नहीं, पहचान से जुड़ी होती है
गुलाबी शहर जयपुर में आयोजित सांस्कृतिक उत्सव ‘जनवरी ऑफ जयपुर’ के दौरान सिनेमा और साहित्य जगत के दिग्गज कवि-गीतकार जावेद अख्तर ने भाषा, पहचान और संस्कृति को लेकर बेबाक विचार रखे। जयमहल पैलेस में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में जावेद अख्तर और सुप्रसिद्ध कथक नृत्यांगना एवं पं. बिरजू महाराज की पौत्री शिंजिनी कुलकर्णी के बीच हुए संवाद ने दर्शकों को गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया।
इस अवसर पर जावेद अख्तर ने बांग्लादेश के इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि यह देश इस बात का जीवंत उदाहरण है कि भाषा लोगों की पहचान का हिस्सा होती है, न कि आस्था का। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के लोगों ने अपनी मातृभाषा बांग्ला के लिए संघर्ष किया। मुस्लिम होने के बावजूद उन्होंने उर्दू को अपनाना जरूरी नहीं समझा, क्योंकि उनके लिए भाषा उनकी सांस्कृतिक पहचान थी। अख्तर ने कहा, “भाषा आस्था से नहीं, पहचान से जुड़ी होती है। किसी भाषा को किसी धर्म से जोड़ना सही नहीं है।”
जावेद अख्तर ने हिंदी और उर्दू के रिश्ते पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि हिंदी और उर्दू की व्याकरण एक ही है, जो दुनिया में बहुत कम देखने को मिलता है। “ये दोनों भाषाएं एक ही मां ‘खड़ी बोली’ की बेटियां हैं,” उन्होंने कहा। अख्तर ने यह भी स्पष्ट किया कि भाषा का संबंध धर्म से नहीं, बल्कि क्षेत्र, समाज और संस्कृति से होता है। उन्होंने यूरोप का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां एक ही धर्म के लोग होने के बावजूद अलग-अलग भाषाएं बोली जाती हैं, जो यह साबित करता है कि भाषा और धर्म को जोड़ना एक गलत सोच है।
कार्यक्रम के दौरान शिंजिनी कुलकर्णी के साथ संवाद में जावेद अख्तर ने कला, साहित्य और समाज की भूमिका पर भी विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि कला और साहित्य समाज को आईना दिखाने का काम करते हैं और कलाकार की जिम्मेदारी होती है कि वह सच को बिना डर के सामने रखे। शिंजिनी कुलकर्णी ने कथक, परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा पर अपने विचार रखते हुए भारतीय शास्त्रीय नृत्य की गहराई और उसकी सांस्कृतिक विरासत पर प्रकाश डाला।
‘जनवरी ऑफ जयपुर’ उत्सव सांस्कृतिक रंगों से सराबोर नजर आया। जयमहल पैलेस का ऐतिहासिक वातावरण, साहित्य और शास्त्रीय कला की गरिमा के साथ एक खास अनुभव में बदल गया। कार्यक्रम में शहर के गणमान्य नागरिकों, कला प्रेमियों और युवाओं की बड़ी संख्या में मौजूदगी रही।
दर्शकों ने जावेद अख्तर की बातों को खूब सराहा। उनकी स्पष्टवादिता और तार्किक दृष्टिकोण ने भाषा और पहचान को लेकर चल रही बहस को एक नई दिशा दी। कार्यक्रम के अंत में तालियों की गूंज ने यह साबित कर दिया कि साहित्य और संस्कृति पर आधारित संवाद आज भी लोगों के दिलों को जोड़ने की ताकत रखते हैं।